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    छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: घर में प्रार्थना सभा के लिए किसी भी अनुमति की जरूरत नहीं, धार्मिक स्वतंत्रता पर अहम टिप्पणी

    छत्तीसगढ़, 1 अप्रैल (अन्‍नू): छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि देश का कोई भी कानून किसी नागरिक को अपने निजी निवास के भीतर प्रार्थना सभा या धार्मिक आयोजन करने से नहीं रोकता है। कोर्ट के अनुसार, अपने घर में इस तरह के आयोजन करने के लिए किसी भी सरकारी प्राधिकरण या स्थानीय प्रशासन से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य नहीं है।



    यह टिप्पणी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान आई, जिसमें निजी घर में आयोजित होने वाली प्रार्थना सभाओं पर आपत्ति जताई गई थी। न्यायमूर्ति ने इस आपत्ति को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद के धर्म का पालन करने और उससे जुड़े अनुष्ठान करने का मौलिक अधिकार देता है। यदि इन आयोजनों से किसी भी प्रचलित कानून का उल्लंघन नहीं होता है, तो प्रशासन इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता।


    अदालत ने अपने फैसले में 'धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार' को रेखांकित करते हुए कहा कि नागरिकों को अपने निजी स्थान पर शांतिपूर्ण ढंग से पूजा-अर्चना करने का पूर्ण अधिकार है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि ये आयोजन सार्वजनिक शांति को भंग करने वाले नहीं होने चाहिए। इस स्पष्टीकरण से उन लोगों को बड़ी राहत मिली है, जिन्हें अक्सर अपने घरों में छोटे धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करने पर पड़ोसियों या स्थानीय अधिकारियों की तरफ से अनावश्यक आपत्तियों का सामना करना पड़ता था।

    कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाईकोर्ट का यह फैसला भविष्य में निजी धार्मिक आयोजनों से जुड़े विवादों को सुलझाने में एक नजीर (Precedent) साबित होगा। कोर्ट ने कड़े शब्दों में जोर दिया कि कानून का पालन करते हुए किए जा रहे किसी भी धार्मिक कृत्य के लिए किसी भी व्यक्ति को बेवजह परेशान नहीं किया जाना चाहिए।



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    'विकसित छत्तीसगढ़-2047' के लक्ष्य की प्राप्ति में हर्बल सेक्टर की भूमिका अहम: रायपुर में राज्य स्तरीय संगोष्ठी संपन्न

    छत्तीसगढ़/रायपुर, 22 मार्च (अन्‍नू): अंतर्राष्ट्रीय वन दिवस के गौरवशाली अवसर पर छत्तीसगढ़ आदिवासी स्थानीय स्वास्थ्य परंपरा एवं औषधि पादप बोर्ड द्वारा एक महत्वपूर्ण राज्य स्तरीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। "2047 के विकसित छत्तीसगढ़ लक्ष्य को पूरा करने में हर्बल सेक्टर की भूमिका" विषय पर केंद्रित यह कार्यक्रम रायपुर के जीरो पॉइंट स्थित राज्य वन अनुसंधान परिसर के बोर्ड कार्यालय सभागार में संपन्न हुआ। इस संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य औषधीय पौधों के संरक्षण और हर्बल क्षेत्र में नवाचार के माध्यम से राज्य की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करना था।


    कार्यक्रम को संबोधित करते हुए बोर्ड के मुख्य कार्यपालन अधिकारी जे.ए.सी.एस. राव ने प्रतिभागियों को प्रेरित करते हुए कहा कि राज्य शासन की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठाकर औषधीय पौधों की खेती को एक लाभदायक व्यवसाय के रूप में अपनाया जा सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस क्षेत्र में सक्रिय भागीदारी से न केवल ग्रामीणों और किसानों की आय में वृद्धि होगी, बल्कि युवाओं के लिए रोजगार के नए और स्थायी अवसर भी सृजित होंगे। राव ने विशेष रूप से युवाओं और आम नागरिकों से आह्वान किया कि वे हर्बल सेक्टर में स्टार्टअप और उद्यमिता के साथ आगे आएं ताकि 'विकसित छत्तीसगढ़-2047' के विजन को धरातल पर उतारा जा सके।



    संगोष्ठी के दौरान तकनीकी सत्रों में विशेषज्ञों द्वारा आधुनिक कृषि पद्धतियों और वैज्ञानिक तकनीकों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन के माध्यम से प्रतिभागियों को औषधीय पौधों के संरक्षण, उनके लिए सुरक्षित क्षेत्रों की अवधारणा और विशेष रूप से टिश्यू कल्चर तकनीक (Tissue Culture Technology) से पौधों के संवर्धन की बारीकियों से अवगत कराया गया। इसके साथ ही सुगंधित और औषधीय पौधों की वैज्ञानिक खेती के तरीकों पर जानकारी साझा की गई, जिससे फसल की गुणवत्ता और पैदावार को बढ़ाया जा सके।


    इस बौद्धिक विमर्श में पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ बायोटेक्नोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. कमलेश कुमार शुक्ला ने एक विशेष व्याख्यान दिया। उन्होंने औषधीय पौधों में पाए जाने वाले सूक्ष्मजीवों (माइक्रोब्स) की महत्वपूर्ण भूमिका पर चर्चा की और बताया कि किस प्रकार ये सूक्ष्मजीव पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और उनकी औषधीय गुणवत्ता को निखारने में सहायक होते हैं। कार्यक्रम में विभिन्न महाविद्यालयों के छात्र-छात्राओं, स्टार्टअप के इच्छुक युवाओं और गणमान्य नागरिकों ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया। बोर्ड द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं और गतिविधियों पर आधारित वीडियो प्रदर्शन भी इस कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण रहा।



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    खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 25 मार्च से 6 अप्रैल के बीच; खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया बोले: ‘अवसर और दायरे को बढ़ाने का हिस्सा’

    आरएस अनेजा, 6 मार्च नई दिल्ली - पहले खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स का आयोजन 25 मार्च से 6 अप्रैल के बीच छत्तीसगढ़ के तीन शहरों – रायपुर, जगदलपुर और सरगुजा – में किया जाएगा। इसकी घोषणा गुरुवार को केंद्रीय युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्री डॉ. मनसुख मांडविया ने की।

    इन खेलों में सात पदक स्पर्धाएँ – एथलेटिक्स, फुटबॉल, हॉकी, वेटलिफ्टिंग, तीरंदाजी, तैराकी और कुश्ती- शामिल होंगी। इसके अलावा दो डेमो गेम– मल्लखंभ और कबड्डी – भी आयोजित किए जाएंगे। खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स (KITG) में भारत के अधिकांश राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के खिलाड़ी हिस्सा लेंगे।

    डॉ. मांडविया ने कहा, “खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स हमारे बढ़ते हुए प्रयासों का हिस्सा हैं, जिनका उद्देश्य हर उस युवा को अवसर और मंच प्रदान करना है जो खेलना चाहता है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत के विजन का हिस्सा है, और इस यात्रा में खेलों की बहुत बड़ी भूमिका है।”

    पहले खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स (KITG) का लोगो, थीम सॉन्ग और मैस्कॉट 23 दिसंबर को बिलासपुर के स्वर्गीय बी. आर. यादव स्पोर्ट्स स्टेडियम में औपचारिक रूप से लॉन्च किया गया था। इस समारोह में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और उपमुख्यमंत्री श्री अरुण साव भी उपस्थित थे।

    डॉ. मांडविया ने इस बात पर जोर दिया कि ये खेल आदिवासी क्षेत्रों से उभर रही प्रतिभाओं को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। उन्होंने कहा, “आदिवासी क्षेत्रों से प्रतिभाओं को सामने लाना बेहद अहम है और हमारे खिलाड़ी आधार का लगातार विस्तार समय की आवश्यकता है। हम यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि आदिवासी समुदायों के प्रतिभाशाली युवाओं की जल्द पहचान हो, उन्हें व्यवस्थित तरीके से समर्थन मिले और उन्हें राष्ट्रीय खेल ढांचे में शामिल किया जाए।”

    खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स 2026 का आयोजन युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय, भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI), भारतीय ओलंपिक संघ, राष्ट्रीय खेल महासंघों और छत्तीसगढ़ राज्य आयोजन समिति द्वारा संयुक्त रूप से किया जाएगा। इन खेलों के तकनीकी मानक अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं के अनुरूप रखे जाएंगे।

    आधिकारिक मैस्कॉट ‘मोरवीर’ का नाम छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा है। यह दो शब्दों से बना है – ‘मोर’, जिसका छत्तीसगढ़ी में अर्थ ‘मेरा’ या ‘हमारा’ होता है, और ‘वीर’, जो साहस और पराक्रम का प्रतीक है। मोरवीर भारत के आदिवासी समुदायों की भावना, गर्व और पहचान का प्रतिनिधित्व करता है।

    आदिवासी खिलाड़ियों को समर्पित इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय आयोजन की मेजबानी करने वाला छत्तीसगढ़ पहला राज्य बन गया है, जो भारत की खेल यात्रा में आदिवासी सशक्तिकरण और जमीनी स्तर पर भागीदारी को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।

    खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स, भारत सरकार के युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय की प्रमुख खेलो इंडिया योजना का हिस्सा हैं, जिसका उद्देश्य जनभागीदारी बढ़ाना और खेलों में उत्कृष्टता को बढ़ावा देना है। वर्ष 2020 में स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्टिंग सिग्नल्स एक्ट, 2007 के तहत खेलो इंडिया गेम्स को ‘राष्ट्रीय महत्व का आयोजन’ घोषित किया गया था।             

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    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छत्तीसगढ़ के लोगों को 'बस्तर पंडुम' त्योहार के विशेष आयोजन पर बधाई दी

    आरएस अनेजा, 10 फरवरी नई दिल्ली - प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने छत्तीसगढ़ में मनाए गए 'बस्तर पंडुम' उत्सव के लिए छत्तीसगढ़वासियों को हार्दिक बधाई दी है।

    इस उत्सव के दौरान बस्तर की समृद्ध संस्कृति, परंपराओं और आदिवासी विरासत का भव्य प्रदर्शन किया गया। नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि ऐसे आयोजन हमारी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

     

    मोदी ने कहा, “पहले जब भी बस्तर का नाम लिया जाता था तब माओवाद, हिंसा और विकास में पिछड़ेपन की छवि मन में आती थी। लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल गई है। आज बस्तर न केवल अपने विकास के लिए बल्कि यहां के लोगों के बढ़ते आत्मविश्वास के लिए भी जाना जाता है। मेरी यही कामना है कि आने वाला समय इस क्षेत्र के लिए शांति, प्रगति और सांस्कृतिक गौरव की भावना से परिपूर्ण हो।”

     

    केंद्रीय मंत्री श्री अमित शाह की ओर से X पर किए गए एक पोस्ट के उत्तर में श्री मोदी ने कहा:

     

    "7 से 9 फरवरी के बीच छत्तीसगढ़ में ‘बस्तर पंडुम’ का विशेष आयोजन किया गया। इस उत्सव के दौरान बस्तर की समृद्ध संस्कृति, परंपरा और जनजातीय विरासत का भव्य रूप दिखा। इस प्रयास से जुड़े अपने सभी परिवारजनों को मेरी हार्दिक बधाई। ऐसे आयोजन हमारी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं।

    पहले जब बस्तर का नाम लिया जाता था तो माओवाद, हिंसा और विकास में पिछड़ेपन की छवि उभरती थी। लेकिन अब हालात बिल्कुल बदल चुके हैं। आज बस्तर विकास के साथ-साथ स्थानीय लोगों के बढ़ते आत्मविश्वास के लिए जाना जाता है। मेरी यही कामना है कि यहां का आने वाला समय शांति, प्रगति और सांस्कृतिक गौरव की भावना से परिपूर्ण हो।"