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    पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट के जस्टिस महाबीर सिंह सिंधु का निधन, 59 वर्ष की उम्र में गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में ली अंतिम सांस

    अभिकान्त, 28 जून चंडीगढ़ : पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के मौजूदा न्यायाधीश जस्टिस महाबीर सिंह सिंधु का रविवार तड़के निधन हो गया। वह 59 वर्ष के थे और पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। हाई कोर्ट प्रशासन से मिली जानकारी के अनुसार, उन्होंने गुरुग्राम स्थित मेदांता अस्पताल में सुबह 2 बजकर 50 मिनट पर अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से न्यायिक जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।

    जस्टिस महाबीर सिंह सिंधु को 10 जुलाई 2017 को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के अतिरिक्त न्यायाधीश (Additional Judge) के रूप में नियुक्त किया गया था। इसके बाद, उनकी बेहतरीन कार्यप्रणाली को देखते हुए 3 दिसंबर 2018 को उन्हें हाई कोर्ट का स्थायी न्यायाधीश (Permanent Judge) बनाया गया। अपने शानदार और गरिमामयी कार्यकाल के दौरान उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण संवैधानिक, आपराधिक, दीवानी (सिविल) और सेवा (सर्विस) से जुड़े मामलों की सुनवाई कर न्यायिक व्यवस्था में अपना अभूतपूर्व योगदान दिया।

    वकालत के दिनों में जस्टिस सिंधु ने मुख्य रूप से पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट में ही अपनी प्रैक्टिस की। वह हरियाणा लोक सेवा आयोग (HPSC), कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, इंडियन रेड क्रॉस सोसायटी (हरियाणा शाखा), विभिन्न सहकारी बैंकों और बीएसएनएल सहित कई बड़े सरकारी निकायों के अधिकृत अधिवक्ता भी रहे।

    हाई कोर्ट प्रशासन और पारिवारिक सूत्रों के मुताबिक, दिवंगत जस्टिस महाबीर सिंह सिंधु का पार्थिव शरीर उनके गृह क्षेत्र ले जाया जाएगा। उनका अंतिम संस्कार रविवार शाम ठीक पांच बजे उनके पैतृक गांव मसूदपुर (जिला हांसी) में पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा, जहां न्यायिक सेवा और प्रशासनिक सेवा से जुड़े कई गणमान्य लोग उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचेंगे।

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    पारिवारिक पेंशन पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: एकमात्र जीवित दावेदार होने पर दूसरी पत्नी को मिलेगा पूर्ण लाभ

    अभिकान्त, 18 जून चंडीगढ़ : पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पारिवारिक पेंशन को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा है कि किसी मृत सरकारी कर्मचारी की दूसरी पत्नी को केवल इसी आधार पर पूरी पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता कि वह दूसरी पत्नी है, विशेषकर तब जब वह कर्मचारी की एकमात्र जीवित और पात्र दावेदार हो। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि एकमात्र विधवा होने के बावजूद पेंशन को 50 फीसदी तक सीमित करना नियमों की पूरी तरह से गलत व्याख्या है। जस्टिस नमित कुमार की एकल पीठ ने गुरदासपुर निवासी एक महिला की याचिका को स्वीकार करते हुए सरकार के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें उसे केवल आधी पेंशन का हकदार माना गया था। इसके साथ ही अदालत ने संबंधित विभाग को पीड़िता को पूर्ण पारिवारिक पेंशन जारी करने और बकाया राशि का भुगतान ब्याज सहित करने का कड़ा निर्देश दिया है।

    मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता महिला के पति पंजाब सरकार में जिला कोषागार अधिकारी के पद पर तैनात थे और उनका निधन 14 नवंबर 2011 को हुआ था। कर्मचारी की पहली पत्नी का देहांत बहुत पहले 6 नवंबर 1980 को हो चुका था, जिसके बाद याचिकाकर्ता का विवाह 30 मई 1992 को उनके साथ हुआ था। पति की मृत्यु के बाद पंजाब के महालेखाकार (एजी) कार्यालय ने 3 अगस्त 2015 को एक आदेश जारी कर याचिकाकर्ता के लिए केवल 50 फीसदी पारिवारिक पेंशन स्वीकृत की थी और इसके पीछे तर्क दिया गया था कि वह मृत कर्मचारी की दूसरी पत्नी हैं। इस फैसले के खिलाफ महिला ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

    हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के समय याचिकाकर्ता ही उनकी एकमात्र जीवित पत्नी और कानूनी वारिस थीं। अदालत ने विभाग की खिंचाई करते हुए कहा कि एक से अधिक जीवित विधवाओं के बीच पेंशन बंटवारे का नियम इस मामले में बिल्कुल लागू नहीं होता क्योंकि पहली पत्नी का निधन कर्मचारी की सेवाकाल के दौरान ही हो गया था। विभाग की इस गलत व्याख्या के कारण पेंशन का आधा हिस्सा बिना किसी लाभार्थी के सरकारी खाते में ही अटका रह गया, जो कि लोक कल्याणकारी पारिवारिक पेंशन योजना की मूल भावना और नियमों के सर्वथा विपरीत है। हाईकोर्ट ने कानून को स्पष्ट करते हुए दोहराया कि यदि कोई अन्य दावेदार जीवित नहीं है, तो मृत कर्मचारी की दूसरी पत्नी को शत-प्रतिशत पूर्ण पेंशन का लाभ दिया जाएगा।

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    पेड़ों की कटाई पर हाईकोर्ट सख्त: कहा - विकास के लिए पर्यावरण से समझौता नहीं; विकल्प न होने पर ही मिलेगी पेड़ काटने की अनुमति

    अभिकान्त, 30 मई चंडीगढ़ :  पंजाब में विकास परियोजनाओं (इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स) के नाम पर बड़े पैमाने पर हो रही पेड़ों की कटाई के मामलों पर पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है। माननीय अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि विकास कार्यों के लिए पर्यावरण के साथ किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह कड़ा नियम तय कर दिया है कि भविष्य में पेड़ काटने की अनुमति केवल और केवल उसी स्थिति में दी जाएगी, जब संबंधित विभाग या अधिकारी यह अकाट्य रूप से साबित कर देंगे कि परियोजना को पूरा करने के लिए उनके पास कोई दूसरा व्यावहारिक विकल्प मौजूद नहीं है।

    पंजाब में पर्यावरण संरक्षण और हरित क्षेत्र को बचाने के उद्देश्य से मुख्य न्यायाधीश (चीफ जस्टिस) शील नागू और जस्टिस संजीव बेरी की खंडपीठ ने पेड़ों की कटाई से जुड़े विभिन्न मामलों और जनहित याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए कई महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए।

    शर्तों के साथ मंजूरी:

    अदालत ने कुछ बेहद जरूरी और जनहित से जुड़ी परियोजनाओं को बेहद सख्त शर्तों के साथ आगे बढ़ाने की मंजूरी दी है, ताकि पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुंचे।

    अधिकारियों से मांगा विस्तृत जवाब:

    जिन परियोजनाओं के तहत बहुत बड़े पैमाने पर पेड़ों को काटा जाना प्रस्तावित है, उन पर कोर्ट ने कड़ी आपत्ति जताई है। अदालत ने संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को नोटिस जारी कर इस संबंध में विस्तृत जवाब और वैकल्पिक योजनाओं की रिपोर्ट तलब की है।

    पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद अब राज्य में सड़कों के चौड़ीकरण या अन्य निर्माण कार्यों के दौरान ग्रीन कवर को बचाने के लिए प्रशासन को नई और पर्यावरण-अनुकूल नीतियों पर काम करना होगा।

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    चंडीगढ़ ट्रिब्यून चौक फ्लाईओवर पर हाई कोर्ट की रोक: कहा: प्लान के विपरीत है निर्माण, अंडरपास पर विचार के निर्देश

    अभिकान्त, 30 मई चंडीगढ़ : चंडीगढ़ के 'ट्रिब्यून चौक' पर प्रस्तावित फ्लाईओवर परियोजना को पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। मुख्य न्यायाधीश (चीफ जस्टिस) शील नागू की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने शुक्रवार को इस मामले पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट कर दिया कि दक्षिण मार्ग पर प्रस्तावित इस फ्लाईओवर का निर्माण 'चंडीगढ़ मास्टर प्लान-2031' के अनुरूप नहीं है। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि मास्टर प्लान के नियमों और शहर के मूल ढांचे के विपरीत जाकर इस फ्लाईओवर के निर्माण की अनुमति कतई नहीं दी जा सकती।

    अदालत ने ट्रिब्यून चौक पर लगने वाले भीषण ट्रैफिक जाम की समस्या को स्वीकार किया, लेकिन इसके समाधान के लिए एक अलग नजरिया पेश किया। खंडपीठ ने कहा कि शहर की खूबसूरती को बिगाड़े बिना ट्रैफिक समस्या के समाधान के लिए 'अंडरपास' (Underpass) एक स्वीकार्य और व्यावहारिक विकल्प हो सकता है। हाई कोर्ट ने केंद्रशासित प्रदेश (UT) प्रशासन को निर्देश दिए हैं कि वे फ्लाईओवर की जिद छोड़कर इस अंडरपास के विकल्प पर गंभीरता से विचार करें।

    अदालत ने प्रशासन को विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की हिदायत देते हुए कहा कि किसी भी विकास कार्य के दौरान चंडीगढ़ की विश्वप्रसिद्ध मूल पहचान, अद्वितीय शहरी नियोजन और हरी-भरी वादियों (हरियाली) को पूरी तरह सुरक्षित रखा जाए।

    हाई कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब प्रशासन को ट्रिब्यून चौक के ट्रैफिक को नियंत्रित करने के लिए अपनी पूरी कार्ययोजना में बदलाव करना होगा।

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    चंडीगढ़ ट्रिब्यून चौक फ्लाईओवर प्रोजेक्ट को झटका: हाई कोर्ट ने पेड़ों की कटाई और छंटाई पर लगाई अंतरिम रोक

    अभिकान्त, 15 मई चंडीगढ़ :  चंडीगढ़ के बहुचर्चित और लंबे समय से लंबित ट्रिब्यून चौक फ्लाईओवर प्रोजेक्ट को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से एक बड़ा झटका लगा है। अदालत ने परियोजना के मार्ग में आने वाले प्रस्तावित पेड़ों की कटाई और उनकी छंटाई पर अंतरिम रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश शील नागू और न्यायमूर्ति संजीव बेरी की खंडपीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए स्पष्ट आदेश जारी किए हैं कि ट्रिब्यून चौक के आसपास स्थित किसी भी आम या अन्य प्रजाति के पेड़ को अगली सुनवाई तक न तो काटा जाएगा और न ही उसकी शाखाओं को हटाया जाएगा। हाई कोर्ट के इस सख्त रुख के बाद फ्लाईओवर निर्माण के लिए जमीन साफ करने की चल रही प्रक्रिया पर फिलहाल पूरी तरह से विराम लग गया है।

    मामले की सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने रेखांकित किया कि इस संवेदनशील विषय पर पहले ही दोनों पक्षों की ओर से विस्तृत बहस हो चुकी है। अदालत ने अपने आदेश में यह भी साफ कर दिया है कि यह अंतरिम रोक केवल अगली सुनवाई तक के लिए है और यह पूरी तरह से मामले के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगी। पर्यावरणविदों और स्थानीय नागरिकों द्वारा पेड़ों को बचाने के लिए लंबे समय से चलाए जा रहे अभियान के हक में इस फैसले को एक बड़ी अंतरिम राहत के रूप में देखा जा रहा है।

    यह परियोजना चंडीगढ़ में ट्रैफिक जाम की समस्या से निपटने के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है, लेकिन इसके निर्माण के लिए सैकड़ों हेरिटेज और हरे-भरे पेड़ों को काटा जाना प्रस्तावित था, जिसका लगातार विरोध हो रहा था। पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाने की इस कानूनी लड़ाई में अब सभी की नजरें हाई कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी हैं। इस आदेश के बाद प्रशासन को अब परियोजना के क्रियान्वयन के लिए वैकल्पिक रास्तों या तकनीकों पर विचार करना पड़ सकता है, जिससे पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुँचे।

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    राष्ट्रीय लोक अदालत: अम्बाला में 15,974 मामलों का निपटारा, 4.10 करोड़ की राशि का भुगतान।

    अभिकान्त, 09 मई अम्बाला : हरियाणा राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण पंचकूला के निर्देशानुसार राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन 9 मई को किया गया। मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण अम्बाला के सचिव सुश्री गीतांजली गोयल ने बताया की लोगों के लम्बित मामलों का निपटारा करने के लिए समय समय पर लोक अदालतों का आयोजन किया जा रहा है।'


    इस कड़ी में 9 मई को राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन किया गया है। जिसके लिए जिला न्यायालय अंबाला में तथा सब डिवीजन नारायणगढ़ में श्री अरविंद बंसल, अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, श्री प्रशांत राणा, अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश व प्रिंसिपल जज फैमिली कोर्ट, श्री मंजीत पाल, सिविल जज,श्री ध्रुव सैनी, सिविल जज, सुश्री श्रेया बंसल, सिविल जज, अंबाला व डॉ जितेंद्र कुमार,सिविल जज नारायणगढ़ की कुल 6 बेंचों का गठन किया गया था। लोक अदालत में वैवाहिक एव पारिवारिक मामले के  186 मामले आपराधिक के 997 मामले, दीवानी (सिविल)  2609 मामले एव बैंक रिकवरी के 1056, एनआईए एक्ट 666 इत्यादि के साथ साथ अन्य मामले भी रखे गए थे, और जिनमें 15974 मामलों का निपटारा किया गया, जिसमें कुल 41081773 राशि का भुगतान किया गया ।


    इस कड़ी में जिला न्यायालय में हेल्प डेस्क भी स्थापित किया गया है ताकि लोगों तक इसकी अधिक से अधिक जानकारी पहुँच सके और ज्यादा से ज्यादा लोग इस लोक अदालत का फायदा ले सकें। अधिक जानकारी के लि. हेल्पलाइन नं- 0171-2532142 व 9991112060 नालसा हेल्पलाइन नंबर 15100 पर संपर्क किया जा सकता है।

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    बैंक खाता फ्रीज करने पर पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट सख्त: मामूली लेनदेन पर पूरा अकाउंट बंद करना गैरकानूनी

    अभिकान्त, 09 मई हरियाणा : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने बैंक खातों को फ्रीज करने की प्रक्रिया को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और राहतकारी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल मामूली संदिग्ध लेनदेन के आधार पर किसी भी व्यक्ति का पूरा बैंक खाता बंद कर देना पूरी तरह से गैरकानूनी और मनमाना कदम है।

    इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस जगमोहन बंसल की बेंच ने एचडीएफसी बैंक को आदेश दिया है कि वह याचिकाकर्ता का खाता तुरंत दोबारा सक्रिय करे। कोर्ट ने यह सख्त टिप्पणी त्रिपत जीत सिंह द्वारा दायर की गई याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिनका खाता महज 5 हजार रुपए की एक संदिग्ध एंट्री के बाद बैंक ने फ्रीज कर दिया था।

    अदालत ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ कोई आधिकारिक एफआईआर दर्ज नहीं है और न ही किसी मजिस्ट्रेट का ऐसा कोई आदेश प्राप्त हुआ है, तो बैंक अपनी मर्जी से किसी का खाता बंद नहीं कर सकता। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया था कि बैंक ने उन्हें बिना किसी पूर्व सूचना के कार्रवाई की, जबकि उनका किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी या आपराधिक मामले से कोई लेना-देना नहीं था।

    हाईकोर्ट ने कहा कि 5 हजार रुपए जैसे छोटे लेनदेन के लिए पूरे खाते की पहुंच रोकना न्यायोचित नहीं है और ऐसी कार्रवाई कानून के तय मानकों के खिलाफ है। इस फैसले से उन लाखों खाताधारकों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है जिनके खाते अक्सर छोटी तकनीकी या संदिग्ध वजहों से बिना सूचना के बंद कर दिए जाते हैं।

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    16/04/26 |

    चंडीगढ़ कोर्ट का बड़ा फैसला: सड़क हादसे में जान गंवाने वाले व्यक्ति के परिवार को मिलेगा ₹44 लाख का मुआवजा

    अभिकान्त, 16 अप्रैल, चंडीगढ़ : चंडीगढ़ जिला अदालत ने अक्टूबर 2022 में हुए एक दुखद सड़क हादसे के मामले में पीड़ित परिवार के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने माना कि यह दुर्घटना पूरी तरह से कार चालक की तेज रफ्तार और लापरवाही का नतीजा थी। न्यायाधीश ने मृतक के परिवार की आर्थिक स्थिति और निर्भरता को देखते हुए ₹43.88 लाख की मुआवजा राशि तय की है। खास बात यह है कि इस राशि पर घटना की तारीख से भुगतान होने तक 7.5% वार्षिक ब्याज भी देय होगा, जिससे कुल सहायता राशि में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी।



    सेक्टर-31/32 लाइट प्वाइंट पर हुआ था दर्दनाक हादसा

    यह मामला 20 अक्टूबर 2022 का है, जब महेश चंद नामक व्यक्ति अपने एक्टिवा स्कूटर पर सवार होकर घर लौट रहे थे। जैसे ही वह सेक्टर-31/32 के लाइट प्वाइंट के पास पहुंचे, एक अनियंत्रित और तेज रफ्तार इनोवा कार ने उनके स्कूटर को जोरदार टक्कर मार दी। चश्मदीदों के अनुसार, टक्कर इतनी भयानक थी कि कार महेश चंद को काफी दूर तक घसीटते हुए ले गई। गंभीर रूप से घायल महेश को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ उपचार के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया।


    साक्ष्यों और गवाहों ने तय की ड्राइवर की संलिप्तता

    अदालत में सुनवाई के दौरान गवाहों के बयान और पुलिस की एफआईआर (FIR) को अहम आधार माना गया। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि कार चालक ने न तो सावधानी बरती और न ही टक्कर से पहले हॉर्न बजाया। ड्राइवर की ओर से अदालत में कोई ठोस बचाव पेश नहीं किया जा सका और न ही वह गवाहों के बयानों को चुनौती दे पाया। साक्ष्यों से यह पूरी तरह साबित हो गया कि मृतक की इस दुर्घटना में कोई गलती नहीं थी और वह नियमों का पालन करते हुए वाहन चला रहे थे।



    बीमा कंपनी की जिम्मेदारी और मुआवजे का आधार

    मुआवजे के भुगतान को लेकर कोर्ट ने बीमा कंपनी को उत्तरदायी ठहराया है। चूंकि हादसे के समय कार का बीमा वैध था और ड्राइवर के पास सही लाइसेंस मौजूद था, इसलिए अदालत ने बीमा कंपनी की उन दलीलों को खारिज कर दिया जिनमें वह जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रही थी। कोर्ट ने माना कि महेश चंद अपने परिवार के एकमात्र कमाऊ सदस्य थे, और उनकी असामयिक मृत्यु से परिवार के सामने गहरा आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। इसी को आधार बनाकर आय और उम्र के हिसाब से राशि निर्धारित की गई।


    परिवार के सदस्यों के बीच राशि का बंटवारा

    अदालत ने पीड़ित परिवार के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए मुआवजे की राशि के वितरण का स्पष्ट खाका तैयार किया है। कुल राशि का 60 प्रतिशत हिस्सा मृतक की पत्नी सजना को दिया जाएगा। वहीं, उनके दो बच्चों, जैश्री और राहुल के भविष्य के लिए 15-15 प्रतिशत हिस्सा तय किया गया है। मृतक के पिता फूल चंद को कुल राशि का 10 प्रतिशत मिलेगा। अदालत ने निर्देश दिए हैं कि यह पूरी राशि सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में जमा की जाए ताकि उन्हें किसी बिचौलिये का सामना न करना पड़े।




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    14/03/26 |

    पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट का अहम फैसला: मनी लॉन्ड्रिंग मामले में 73 वर्षीय दोषी को दी सशर्त जमानत, 20 पौधे लगाने का आदेश

    चंडीगढ़, 14 मार्च 2026: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में सजा काट…..

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    14/03/26 |

    कैथल अदालत का सख्त फैसला : रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़े गए ASI बलविन्द्र सिंह को 4 वर्ष का कारावास

    हरियाणा, 14  मार्च  (अभी) : भ्रष्टाचार के एक मामले में माननीय अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, कैथल की अदालत द्वारा आरोपी सहायक उप-निरीक्षक (ASI) बलविन्द्र सिंह, जिला कैथल को दोषी ठहराते हुए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 तथा धारा 13(1)(b) सहपठित धारा 13(2) के तहत 4 वर्ष के कठोर कारावास एवं 50,000/- रुपये के जुर्माने से दंडित किया गया है। जुर्माना अदा न करने की स्थिति में आरोपी को 5 माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।

    प्रकरण के अनुसार शिकायतकर्ता संदीप कुमार ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, अम्बाला को दी गई शिकायत में आरोप लगाया था कि उसकी माता कृष्णा देवी के विरुद्ध दर्ज मुकदमा संख्या 284/2023 (लड़ाई-झगड़े का मामला), जिसकी जांच पुलिस चौकी भागल में चल रही थी, में गिरफ्तारी का दबाव बनाकर आरोपी द्वारा 60,000 रुपये रिश्वत वसूली गई। इसके अतिरिक्त, इसी मामले में शिकायतकर्ता के पड़ोसी जयपाल के पुत्रों शेखर व अमन तथा शिकायतकर्ता का नाम केस से निकालने के एवज में प्रत्येक व्यक्ति से 50-50 हजार रुपये की रिश्वत तय की गई और 10,000 रुपये अग्रिम रिश्वत की मांग की जा रही थी।

    उक्त शिकायत पर कार्रवाई करते हुए भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, अम्बाला की टीम ने आरोपी ASI बलविन्द्र सिंह को शिकायतकर्ता से 10,000 रुपये रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार किया था। इस संबंध में आरोपी के विरुद्ध अभियोग संख्या 30 दिनांक 12.12.2023 के तहत धारा 7, 13(1)(b) सहपठित धारा 13(2) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 तथा धारा 384 आईपीसी के अंतर्गत थाना भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, अम्बाला में मामला दर्ज किया गया था। जांच पूर्ण होने उपरांत आरोपी के विरुद्ध दिनांक 08.02.2024 को माननीय न्यायालय, कैथल में चालान प्रस्तुत किया गया, जिस पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने आरोपी को दोषी करार देते हुए उपरोक्त सजा सुनाई है।

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    मद्रास हाईकोर्ट के जज जी.आर. स्वामीनाथन के खिलाफ प्रियंका वाड्रा और 100 विपक्षी सांसदों द्वारा महाभियोग प्रस्ताव।

    कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा, डीएमके (DMK) की कनिमोझी, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और अन्य विपक्षी नेताओं सहित 100 से अधिक लोकसभा सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक नोटिस सौंपा है। इस नोटिस में जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन को उनके पद से हटाने (Removal Motion) की मांग की गई है।

    Justice Swaminathan ने 1–3 दिसंबर 2025 को एक आदेश दिया था, जिसमें उन्होंने Thirupparankundram पहाड़ी पर स्थित Subramaniya Swamy Temple — जो एक पुराना मंदिर है — के “दीपथून” (stone pillar / दीप स्तंभ) पर Karthigai Deepam (पारंपरिक दीपोत्सव) के लिए दीया जलाने की अनुमति दी थी।

    विपक्षी सांसदों ने जस्टिस स्वामीनाथन पर गंभीर आरोप लगाए हैं:

    उनका कहना है कि जज निष्पक्ष नहीं हैं और उनके फैसले एक 'विशेष राजनीतिक विचारधारा' से प्रेरित हैं, जो संविधान के धर्मनिरपेक्ष (secular) सिद्धांतों के खिलाफ है ।

    नोटिस में आरोप लगाया गया है कि जज ने एक वरिष्ठ वकील और एक विशेष समुदाय के वकीलों के प्रति अनुचित तरफदारी (favouritism) दिखाई है ।

    कहा जा रहा है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता को खतरा है, क्योंकि एक राजनैतिक दल (INDIA ब्लॉक) –- चुनावी राजनीति के मद्देनज़र — जज को हटा रहे हैं।

    तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी DMK के साथ यह प्रस्ताव भी जुड़ा है, और कहा जा रहा है कि यह एक चुनावी चाल है (क्यूंकि अगले साल विधानसभा चुनाव है)।

    इसके अलावा, कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या सिर्फ एक धार्मिक-संवेदनशील मामले में दिए गए आदेश को महाभियोग के लिए पर्याप्त समझा जाना चाहिए — यानी, क्या यह “दुराचार / misconduct” है या सिर्फ एक विवादास्पद फैसला (judicial disagreement) है।

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