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    अमृतसर में 12 सितंबर को लगेगी राष्ट्रीय लोक अदालत, लंबित मामलों का आपसी सहमति से होगा निपटारा

    अभिकान्त , 08 अगस्त अमृतसर: अदालतों में लंबित मामलों के त्वरित, सस्ते और आपसी सहमति से निपटारे के लिए आगामी 12 सितंबर को अमृतसर की अदालतों में राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन किया जाएगा। जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण, अमृतसर ने राष्ट्रीय कानूनी सेवाएं प्राधिकरण और पंजाब राज्य कानूनी सेवाएं प्राधिकरण के दिशा-निर्देशों के तहत इसकी तैयारियां तेज कर दी हैं। तैयारियों का जायजा लेने और समीक्षा के लिए सचिव-कम-सीजेएम अमरदीप सिंह बैंस ने विभिन्न विभागों और बैंकिंग अधिकारियों के साथ एक महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक की।

    बैठक की अध्यक्षता करते हुए सीजेएम अमरदीप सिंह बैंस ने बताया कि राष्ट्रीय लोक अदालत का मुख्य उद्देश्य लोगों के मुकदमों का आपसी सहमति और सौहार्दपूर्ण समझौते के आधार पर जल्द से जल्द निपटारा करना है। इससे आम जनता को लंबी मुकदमेबाजी से मुक्ति मिलेगी, अदालतों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे और उनके समय व धन दोनों की भारी बचत होगी।

    लोक अदालत में विभिन्न प्रकार के मामलों का निपटारा किया जाएगा, जिनमें एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत चेक बाउंस के मामले, बैंक रिकवरी केस, श्रम विवाद, बिजली व पानी के बिलों से संबंधित मामले, नगर निगम व नगर परिषद से जुड़े हाउस टैक्स, सीवरेज, वाटर सप्लाई व साइट प्लान के विवाद, विभिन्न सिविल मामले, कम गंभीर आपराधिक मामले, वैवाहिक विवाद, मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) के केस और बीमा दावों समेत कई श्रेणियां शामिल हैं।

    सचिव अमरदीप सिंह बैंस ने सभी बैंकों, राजस्व विभाग और अन्य संबंधित विभागों के अधिकारियों से अपील की है कि वे अपने-अपने विभागों में लंबित अधिक से अधिक मामलों को इस राष्ट्रीय लोक अदालत के माध्यम से निपटाने का प्रयास करें। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोक अदालत में सुनाया गया फैसला अंतिम होता है और इसके खिलाफ किसी अन्य अदालत में अपील दायर नहीं की जा सकती। इसके अतिरिक्त, लोक अदालत में मामला सुलझने पर संबंधित पक्ष द्वारा जमा कराई गई पूरी कोर्ट फीस भी नियमानुसार वापस कर दी जाती है।

    जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण ने आम लोगों से अपील की है कि यदि वे अपने लंबित या प्री-लिटिगेशन विवादों का समाधान आपसी सहमति से चाहते हैं, तो वे संबंधित अदालत या जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण, अमृतसर के कार्यालय में अपना आवेदन पत्र समय रहते जमा करा सकते हैं। अधिकारियों के अनुसार लोक अदालत आम नागरिकों को सरल, नि:शुल्क और त्वरित न्याय दिलाने का सबसे प्रभावी और सुलभ माध्यम है।

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    31/07/26 |

    सुप्रीम कोर्ट का समाधान समारोह 21 से 23 अगस्त तक, मध्यस्थता से लंबित मुकदमों के त्वरित निपटान पर जोर

    हरियाणा , 31 जुलाई (अभिकान्त) : हरियाणा सरकार ने  सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आयोजित किए जाने वाले 'समाधान समारोह-2026' की तैयारियां तेज कर दी हैं। मुख्य सचिव अनुराग रस्तोगी ने सभी प्रशासनिक सचिवों को निर्देश दिए हैं कि वे आगामी 21 से 23 अगस्त तक आयोजित होने वाली राष्ट्रव्यापी विशेष लोक अदालत के लिए समझौते या मध्यस्थता के माध्यम से निपटाए जा सकने वाले मामलों की शीघ्र पहचान सुनिश्चित करें। 

    मुख्य सचिव द्वारा सभी प्रशासनिक सचिवों को जारी पत्र में कहा गया है कि इस महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पहल की सफलता के लिए सभी विभाग सक्रिय, समन्वित एवं सकारात्मक भूमिका निभाएं। उन्होंने कहा कि इस अभियान का उद्देश्य मध्यस्थता (मेडिएशन) को बढ़ावा देना, अनावश्यक न्यायिक मुकदमों में कमी लाना तथा वर्षों से लंबित मामलों का शीघ्र, सौहार्दपूर्ण और सहमति के आधार पर निपटारा सुनिश्चित करना है। 

    उन्होंने निर्देश दिए कि सभी विभाग एक सप्ताह के भीतर ऐसे मामलों की पहचान कर लें, जिनका समाधान आपसी सहमति से विशेष लोक अदालत के माध्यम से किया जा सकता है। विभाग मध्यस्थता के लिए उपयुक्त मामलों की पहचान कर उनके प्रभावी निपटान हेतु हरियाणा राज्य विधिक सेवाएं प्राधिकरण तथा संबंधित जिला विधिक सेवाएं प्राधिकरणों के साथ  समन्वय स्थापित करें। 

    इस संबंध में 3 अगस्त को होने वाली समीक्षा बैठक में सभी प्रशासनिक सचिवों की व्यक्तिगत उपस्थिति अनिवार्य रहेगी, जिसमें विभागवार प्रगति की समीक्षा की जाएगी। 

    मुख्य सचिव ने कहा कि यह पहल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा देशभर में विशेष लोक अदालतों के माध्यम से सहमति आधारित विवाद निपटान को प्रोत्साहित करने के लिए शुरू किए गए व्यापक राष्ट्रीय अभियान का हिस्सा है। 

    अनुराग रस्तोगी ने कहा कि विभागों की सक्रिय भागीदारी और समयबद्ध समन्वय से न केवल न्यायालयों में लंबित मामलों का बोझ कम होगा, बल्कि प्रशासनिक कार्यकुशलता में भी वृद्धि होगी और लंबे समय से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे नागरिकों को त्वरित राहत मिल सकेगी।

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    पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: महज संदेह या अटकलों पर सरकारी अफसरों के खिलाफ नहीं हो सकती कार्रवाई

    अभिकान्त, 15 जुलाई हरियाणा : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और आपराधिक मामलों की जांच को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल संदेह, अनुमान या अटकलों के आधार पर किसी भी सरकारी अधिकारी के खिलाफ कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की जा सकती और न ही कोई दंडात्मक कार्रवाई शुरू की जा सकती है।

    अदालत ने कहा कि किसी भी अधिकारी पर जिम्मेदारी तय करने के लिए उसके खिलाफ जानबूझकर किए गए कदाचार (Misconduct) या कर्तव्य में घोर लापरवाही के स्पष्ट, पुख्ता और ठोस साक्ष्य होना अनिवार्य है। जस्टिस नीरजा कुलसन की एकल पीठ ने वर्ष 2016 के रोहतक दुष्कर्म मामले में मुख्य आरोपी की अपील को स्वीकार करते हुए उसे संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया। इसके साथ ही, कोर्ट ने मामले की जांच से जुड़े पुलिस अधिकारियों की ओर से दायर तीन अलग-अलग याचिकाओं को भी मंजूर कर लिया और ट्रायल कोर्ट द्वारा उनके खिलाफ की गईं सभी प्रतिकूल टिप्पणियों को पूरी तरह निरस्त कर दिया।

    यह पूरा मामला 23-24 सितंबर, 2016 की रात रोहतक में दर्ज हुई एक एफआईआर (FIR) से जुड़ा हुआ है, जिसमें एक महिला ने अपहरण और दुष्कर्म के गंभीर आरोप लगाए थे। इस मामले में रोहतक की अतिरिक्त सत्र अदालत (Additional Sessions Court) ने सितंबर 2018 में आरोपी को दोषी करार देते हुए 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इसके साथ ही, ट्रायल कोर्ट ने मामले की जांच करने वाले पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए उनके खिलाफ भी विभागीय व कानूनी कार्रवाई के कड़े निर्देश दिए थे।

    हाईकोर्ट ने अपील पर सुनवाई के दौरान जब मामले के साक्ष्यों का दोबारा और गहराई से परीक्षण किया, तो पाया कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) द्वारा पेश किए गए सबूतों और बयानों में गंभीर विसंगतियां और विरोधाभास हैं। अदालत ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए सम्मान बरी कर दिया। अपने फैसले में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:

    "आपराधिक मामलों की सुनवाई के दौरान अदालतों को पीड़ित के प्रति संवेदनशील जरूर होना चाहिए, लेकिन देश के संविधान के तहत आरोपी को भी समान सुरक्षा और अधिकार प्राप्त हैं। किसी भी व्यक्ति को केवल संभावना, अनुमान या बेहद कमजोर साक्ष्यों के आधार पर गुनहगार नहीं ठहराया जा सकता। कानून का शासन केवल ठोस और विश्वसनीय प्रमाणों की मांग करता है।"

    अदालत ने रिकॉर्ड का विश्लेषण करने के बाद पाया कि संबंधित जांच अधिकारियों का इस मामले में चालान पेश होने से काफी पहले ही तबादला (Transfer) हो चुका था। ऐसे में जांच में रह गई कथित कमियों के लिए उन अधिकारियों की सीधी जिम्मेदारी का कोई भी ठोस सबूत रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं था। इसके अलावा, ट्रायल कोर्ट के पूर्व आदेश पर दर्ज की गई एफआईआर की स्वतंत्र जांच में भी पुलिस अधिकारियों की किसी प्रकार की मिलीभगत या साक्ष्यों में हेरफेर का कोई प्रमाण नहीं मिला था, और जांच एजेंसी इस मामले में पहले ही कोर्ट में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर चुकी है।

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    गेस्ट टीचर मामला: हाईकोर्ट ने पुनर्विचार याचिका स्वीकार कर संबंधित पक्षों से मांगा जवाब

    अभिकान्त, 08 जुलाई चंडीगढ़ : पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट से गेस्ट टीचरों (अतिथि शिक्षकों) को नियमित करने और उन्हें सभी सेवा लाभ प्रदान करने से जुड़े एक बड़े मामले में नया मोड़ आ गया है। हाईकोर्ट की एकल पीठ (सिंगल बेंच) ने पूर्व में दिए गए अपने आदेशों के खिलाफ दायर एक पुनर्विचार याचिका (Review Petition) को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। इस मामले में अदालत ने कड़ा संज्ञान लेते हुए संबंधित पक्षों को आधिकारिक नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब तलब किया है।

    प्राप्त जानकारी के अनुसार, हाईकोर्ट की एकल पीठ ने बीते 25 मई को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था, जिसके तहत राज्य के गेस्ट टीचरों को नियमित (रैगुलर) करने और उन्हें अन्य नियमित कर्मचारियों की तरह समस्त वित्तीय व सेवा लाभ देने के आदेश जारी किए गए थे। इस फैसले से जहां अतिथि शिक्षकों में खुशी की लहर थी, वहीं प्रशासनिक और तकनीकी आधारों को रेखांकित करते हुए इस आदेश को चुनौती देने की तैयारी भी शुरू हो गई थी।

    25 मई के इसी फैसले को चुनौती देते हुए दलीप सिंह एवं अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा हाईकोर्ट में एक पुनर्विचार याचिका दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ताओं का पक्ष सुनने के बाद माननीय जज की एकल पीठ ने इस पुनर्विचार याचिका को स्वीकार कर लिया। अदालत ने माना कि मामले के कानूनी पहलुओं और तथ्यों की गहराई से दोबारा समीक्षा करने की आवश्यकता है। इसी के मद्देनजर कोर्ट ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर अपना पक्ष और जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

    अदालत ने दोनों पक्षों को अपना जवाब तैयार करने और उसे रिकॉर्ड पर लाने के लिए समय दिया है। हाईकोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 9 सितंबर की तारीख मुकर्रर की है। कानूनी जानकारों का मानना है कि सितंबर में होने वाली यह सुनवाई सूबे के हजारों गेस्ट टीचरों के भविष्य और शिक्षा विभाग की नीतिगत व्यवस्था के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण साबित होगी। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि संबंधित पक्ष अदालत के नोटिस का क्या जवाब दाखिल करते हैं।

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    राष्ट्रीय लोक अदालत: अम्बाला में 15,974 मामलों का निपटारा, 4.10 करोड़ की राशि का भुगतान।

    अभिकान्त, 09 मई अम्बाला : हरियाणा राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण पंचकूला के निर्देशानुसार राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन 9 मई को किया गया। मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण अम्बाला के सचिव सुश्री गीतांजली गोयल ने बताया की लोगों के लम्बित मामलों का निपटारा करने के लिए समय समय पर लोक अदालतों का आयोजन किया जा रहा है।'


    इस कड़ी में 9 मई को राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन किया गया है। जिसके लिए जिला न्यायालय अंबाला में तथा सब डिवीजन नारायणगढ़ में श्री अरविंद बंसल, अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, श्री प्रशांत राणा, अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश व प्रिंसिपल जज फैमिली कोर्ट, श्री मंजीत पाल, सिविल जज,श्री ध्रुव सैनी, सिविल जज, सुश्री श्रेया बंसल, सिविल जज, अंबाला व डॉ जितेंद्र कुमार,सिविल जज नारायणगढ़ की कुल 6 बेंचों का गठन किया गया था। लोक अदालत में वैवाहिक एव पारिवारिक मामले के  186 मामले आपराधिक के 997 मामले, दीवानी (सिविल)  2609 मामले एव बैंक रिकवरी के 1056, एनआईए एक्ट 666 इत्यादि के साथ साथ अन्य मामले भी रखे गए थे, और जिनमें 15974 मामलों का निपटारा किया गया, जिसमें कुल 41081773 राशि का भुगतान किया गया ।


    इस कड़ी में जिला न्यायालय में हेल्प डेस्क भी स्थापित किया गया है ताकि लोगों तक इसकी अधिक से अधिक जानकारी पहुँच सके और ज्यादा से ज्यादा लोग इस लोक अदालत का फायदा ले सकें। अधिक जानकारी के लि. हेल्पलाइन नं- 0171-2532142 व 9991112060 नालसा हेल्पलाइन नंबर 15100 पर संपर्क किया जा सकता है।

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    16/04/26 |

    चंडीगढ़ कोर्ट का बड़ा फैसला: सड़क हादसे में जान गंवाने वाले व्यक्ति के परिवार को मिलेगा ₹44 लाख का मुआवजा

    अभिकान्त, 16 अप्रैल, चंडीगढ़ : चंडीगढ़ जिला अदालत ने अक्टूबर 2022 में हुए एक दुखद सड़क हादसे के मामले में पीड़ित परिवार के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने माना कि यह दुर्घटना पूरी तरह से कार चालक की तेज रफ्तार और लापरवाही का नतीजा थी। न्यायाधीश ने मृतक के परिवार की आर्थिक स्थिति और निर्भरता को देखते हुए ₹43.88 लाख की मुआवजा राशि तय की है। खास बात यह है कि इस राशि पर घटना की तारीख से भुगतान होने तक 7.5% वार्षिक ब्याज भी देय होगा, जिससे कुल सहायता राशि में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी।



    सेक्टर-31/32 लाइट प्वाइंट पर हुआ था दर्दनाक हादसा

    यह मामला 20 अक्टूबर 2022 का है, जब महेश चंद नामक व्यक्ति अपने एक्टिवा स्कूटर पर सवार होकर घर लौट रहे थे। जैसे ही वह सेक्टर-31/32 के लाइट प्वाइंट के पास पहुंचे, एक अनियंत्रित और तेज रफ्तार इनोवा कार ने उनके स्कूटर को जोरदार टक्कर मार दी। चश्मदीदों के अनुसार, टक्कर इतनी भयानक थी कि कार महेश चंद को काफी दूर तक घसीटते हुए ले गई। गंभीर रूप से घायल महेश को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ उपचार के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया।


    साक्ष्यों और गवाहों ने तय की ड्राइवर की संलिप्तता

    अदालत में सुनवाई के दौरान गवाहों के बयान और पुलिस की एफआईआर (FIR) को अहम आधार माना गया। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि कार चालक ने न तो सावधानी बरती और न ही टक्कर से पहले हॉर्न बजाया। ड्राइवर की ओर से अदालत में कोई ठोस बचाव पेश नहीं किया जा सका और न ही वह गवाहों के बयानों को चुनौती दे पाया। साक्ष्यों से यह पूरी तरह साबित हो गया कि मृतक की इस दुर्घटना में कोई गलती नहीं थी और वह नियमों का पालन करते हुए वाहन चला रहे थे।



    बीमा कंपनी की जिम्मेदारी और मुआवजे का आधार

    मुआवजे के भुगतान को लेकर कोर्ट ने बीमा कंपनी को उत्तरदायी ठहराया है। चूंकि हादसे के समय कार का बीमा वैध था और ड्राइवर के पास सही लाइसेंस मौजूद था, इसलिए अदालत ने बीमा कंपनी की उन दलीलों को खारिज कर दिया जिनमें वह जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रही थी। कोर्ट ने माना कि महेश चंद अपने परिवार के एकमात्र कमाऊ सदस्य थे, और उनकी असामयिक मृत्यु से परिवार के सामने गहरा आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। इसी को आधार बनाकर आय और उम्र के हिसाब से राशि निर्धारित की गई।


    परिवार के सदस्यों के बीच राशि का बंटवारा

    अदालत ने पीड़ित परिवार के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए मुआवजे की राशि के वितरण का स्पष्ट खाका तैयार किया है। कुल राशि का 60 प्रतिशत हिस्सा मृतक की पत्नी सजना को दिया जाएगा। वहीं, उनके दो बच्चों, जैश्री और राहुल के भविष्य के लिए 15-15 प्रतिशत हिस्सा तय किया गया है। मृतक के पिता फूल चंद को कुल राशि का 10 प्रतिशत मिलेगा। अदालत ने निर्देश दिए हैं कि यह पूरी राशि सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में जमा की जाए ताकि उन्हें किसी बिचौलिये का सामना न करना पड़े।




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    14/03/26 |

    पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट का अहम फैसला: मनी लॉन्ड्रिंग मामले में 73 वर्षीय दोषी को दी सशर्त जमानत, 20 पौधे लगाने का आदेश

    चंडीगढ़, 14 मार्च 2026: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में सजा काट…..

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    14/03/26 |

    कैथल अदालत का सख्त फैसला : रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़े गए ASI बलविन्द्र सिंह को 4 वर्ष का कारावास

    हरियाणा, 14  मार्च  (अभी) : भ्रष्टाचार के एक मामले में माननीय अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, कैथल की अदालत द्वारा आरोपी सहायक उप-निरीक्षक (ASI) बलविन्द्र सिंह, जिला कैथल को दोषी ठहराते हुए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 तथा धारा 13(1)(b) सहपठित धारा 13(2) के तहत 4 वर्ष के कठोर कारावास एवं 50,000/- रुपये के जुर्माने से दंडित किया गया है। जुर्माना अदा न करने की स्थिति में आरोपी को 5 माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।

    प्रकरण के अनुसार शिकायतकर्ता संदीप कुमार ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, अम्बाला को दी गई शिकायत में आरोप लगाया था कि उसकी माता कृष्णा देवी के विरुद्ध दर्ज मुकदमा संख्या 284/2023 (लड़ाई-झगड़े का मामला), जिसकी जांच पुलिस चौकी भागल में चल रही थी, में गिरफ्तारी का दबाव बनाकर आरोपी द्वारा 60,000 रुपये रिश्वत वसूली गई। इसके अतिरिक्त, इसी मामले में शिकायतकर्ता के पड़ोसी जयपाल के पुत्रों शेखर व अमन तथा शिकायतकर्ता का नाम केस से निकालने के एवज में प्रत्येक व्यक्ति से 50-50 हजार रुपये की रिश्वत तय की गई और 10,000 रुपये अग्रिम रिश्वत की मांग की जा रही थी।

    उक्त शिकायत पर कार्रवाई करते हुए भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, अम्बाला की टीम ने आरोपी ASI बलविन्द्र सिंह को शिकायतकर्ता से 10,000 रुपये रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार किया था। इस संबंध में आरोपी के विरुद्ध अभियोग संख्या 30 दिनांक 12.12.2023 के तहत धारा 7, 13(1)(b) सहपठित धारा 13(2) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 तथा धारा 384 आईपीसी के अंतर्गत थाना भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, अम्बाला में मामला दर्ज किया गया था। जांच पूर्ण होने उपरांत आरोपी के विरुद्ध दिनांक 08.02.2024 को माननीय न्यायालय, कैथल में चालान प्रस्तुत किया गया, जिस पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने आरोपी को दोषी करार देते हुए उपरोक्त सजा सुनाई है।

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    मद्रास हाईकोर्ट के जज जी.आर. स्वामीनाथन के खिलाफ प्रियंका वाड्रा और 100 विपक्षी सांसदों द्वारा महाभियोग प्रस्ताव।

    कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा, डीएमके (DMK) की कनिमोझी, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और अन्य विपक्षी नेताओं सहित 100 से अधिक लोकसभा सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक नोटिस सौंपा है। इस नोटिस में जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन को उनके पद से हटाने (Removal Motion) की मांग की गई है।

    Justice Swaminathan ने 1–3 दिसंबर 2025 को एक आदेश दिया था, जिसमें उन्होंने Thirupparankundram पहाड़ी पर स्थित Subramaniya Swamy Temple — जो एक पुराना मंदिर है — के “दीपथून” (stone pillar / दीप स्तंभ) पर Karthigai Deepam (पारंपरिक दीपोत्सव) के लिए दीया जलाने की अनुमति दी थी।

    विपक्षी सांसदों ने जस्टिस स्वामीनाथन पर गंभीर आरोप लगाए हैं:

    उनका कहना है कि जज निष्पक्ष नहीं हैं और उनके फैसले एक 'विशेष राजनीतिक विचारधारा' से प्रेरित हैं, जो संविधान के धर्मनिरपेक्ष (secular) सिद्धांतों के खिलाफ है ।

    नोटिस में आरोप लगाया गया है कि जज ने एक वरिष्ठ वकील और एक विशेष समुदाय के वकीलों के प्रति अनुचित तरफदारी (favouritism) दिखाई है ।

    कहा जा रहा है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता को खतरा है, क्योंकि एक राजनैतिक दल (INDIA ब्लॉक) –- चुनावी राजनीति के मद्देनज़र — जज को हटा रहे हैं।

    तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी DMK के साथ यह प्रस्ताव भी जुड़ा है, और कहा जा रहा है कि यह एक चुनावी चाल है (क्यूंकि अगले साल विधानसभा चुनाव है)।

    इसके अलावा, कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या सिर्फ एक धार्मिक-संवेदनशील मामले में दिए गए आदेश को महाभियोग के लिए पर्याप्त समझा जाना चाहिए — यानी, क्या यह “दुराचार / misconduct” है या सिर्फ एक विवादास्पद फैसला (judicial disagreement) है।

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