Skip to Videos
  • images (60).jpg
  • photo-collage.png (79).jpg

    चंडीगढ़ ट्रिब्यून चौक फ्लाईओवर प्रोजेक्ट को झटका: हाई कोर्ट ने पेड़ों की कटाई और छंटाई पर लगाई अंतरिम रोक

    अभिकान्त, 15 मई चंडीगढ़ :  चंडीगढ़ के बहुचर्चित और लंबे समय से लंबित ट्रिब्यून चौक फ्लाईओवर प्रोजेक्ट को पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट से एक बड़ा झटका लगा है। अदालत ने परियोजना के मार्ग में आने वाले प्रस्तावित पेड़ों की कटाई और उनकी छंटाई पर अंतरिम रोक लगा दी है। मुख्य न्यायाधीश शील नागू और न्यायमूर्ति संजीव बेरी की खंडपीठ ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए स्पष्ट आदेश जारी किए हैं कि ट्रिब्यून चौक के आसपास स्थित किसी भी आम या अन्य प्रजाति के पेड़ को अगली सुनवाई तक न तो काटा जाएगा और न ही उसकी शाखाओं को हटाया जाएगा। हाई कोर्ट के इस सख्त रुख के बाद फ्लाईओवर निर्माण के लिए जमीन साफ करने की चल रही प्रक्रिया पर फिलहाल पूरी तरह से विराम लग गया है।

    मामले की सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने रेखांकित किया कि इस संवेदनशील विषय पर पहले ही दोनों पक्षों की ओर से विस्तृत बहस हो चुकी है। अदालत ने अपने आदेश में यह भी साफ कर दिया है कि यह अंतरिम रोक केवल अगली सुनवाई तक के लिए है और यह पूरी तरह से मामले के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगी। पर्यावरणविदों और स्थानीय नागरिकों द्वारा पेड़ों को बचाने के लिए लंबे समय से चलाए जा रहे अभियान के हक में इस फैसले को एक बड़ी अंतरिम राहत के रूप में देखा जा रहा है।

    यह परियोजना चंडीगढ़ में ट्रैफिक जाम की समस्या से निपटने के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है, लेकिन इसके निर्माण के लिए सैकड़ों हेरिटेज और हरे-भरे पेड़ों को काटा जाना प्रस्तावित था, जिसका लगातार विरोध हो रहा था। पर्यावरण संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाने की इस कानूनी लड़ाई में अब सभी की नजरें हाई कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी हैं। इस आदेश के बाद प्रशासन को अब परियोजना के क्रियान्वयन के लिए वैकल्पिक रास्तों या तकनीकों पर विचार करना पड़ सकता है, जिससे पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुँचे।

    #TribuneChowkFlyover #PunjabHaryanaHighCourt #ChandigarhNews #EnvironmentProtection #SaveTrees #HighCourtStay #ChandigarhTraffic #InfrastructureVsEnvironment #LegalUpdate #GreenChandigarh #Danikkhabar

  • download - 2026-05-14T122841.900.jpg

    दिल्ली हाई कोर्ट: बिना FIR या ठोस कारण बैंक खाता फ्रीज करना 'जीवन के अधिकार' का उल्लंघन

    अभिकान्त, 14 मई नई दिल्ली : दिल्ली हाई कोर्ट ने साइबर अपराधों की जांच के दौरान बैंक खातों को फ्रीज करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि बिना किसी उचित कारण, प्राथमिकी (FIR) या न्यायिक आदेश के किसी व्यक्ति का बैंक खाता फ्रीज करना संविधान द्वारा दिए गए 'जीवन के अधिकार' (Article 21) में बाधा डालने के समान है। न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव की पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि बैंक खाता किसी भी व्यक्ति के आर्थिक अस्तित्व का मूल आधार होता है और इसे मनमाने ढंग से बंद नहीं किया जा सकता।

    मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि अक्सर देखा गया है कि साइबर सेल या जांच एजेंसियां केवल संदेह के आधार पर बैंक खातों को फ्रीज कर देती हैं, जिससे संबंधित व्यक्ति को गंभीर वित्तीय और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। पीठ ने रेखांकित किया कि यदि खाताधारक के खिलाफ कोई ठोस आरोप, एफआईआर या न्यायालय का स्पष्ट निर्देश नहीं है, तो केवल जांच के नाम पर किसी के आर्थिक संसाधनों को रोकना कानूनन सही नहीं है। बैंक खातों का इस्तेमाल व्यक्ति अपनी बुनियादी जरूरतों और दैनिक जीवन के संचालन के लिए करता है, ऐसे में बिना प्रक्रिया का पालन किए की गई कार्रवाई उसके जीवन जीने के अधिकार को प्रभावित करती है।

    अदालत ने जांच एजेंसियों को नसीहत देते हुए कहा कि साइबर अपराधों की रोकथाम जरूरी है, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि आम नागरिकों के अधिकारों का हनन किया जाए। कोर्ट ने आदेश दिया कि बैंक खातों को फ्रीज करने से पहले जांच एजेंसियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इसके पीछे पर्याप्त साक्ष्य और उचित कानूनी आधार मौजूद हैं। इस फैसले को उन हजारों बैंक खाताधारकों के लिए एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है, जिनके खाते अक्सर बिना किसी पूर्व सूचना या स्पष्ट कारण के फ्रीज कर दिए जाते हैं, जिससे उन्हें अपनी ही जमा पूंजी के लिए अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं।

    #DelhiHighCourt #BankAcountFreeze #RightToLife #CyberCrimeUpdate #Justice #LegalNews #BankingLaw #CommonManRights #HighCourtVerdict #FinancialFreedom #Danikkhabar

  • P--17.jpg

    राष्ट्रीय लोक अदालत: अम्बाला में 15,974 मामलों का निपटारा, 4.10 करोड़ की राशि का भुगतान।

    अभिकान्त, 09 मई अम्बाला : हरियाणा राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण पंचकूला के निर्देशानुसार राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन 9 मई को किया गया। मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण अम्बाला के सचिव सुश्री गीतांजली गोयल ने बताया की लोगों के लम्बित मामलों का निपटारा करने के लिए समय समय पर लोक अदालतों का आयोजन किया जा रहा है।'


    इस कड़ी में 9 मई को राष्ट्रीय लोक अदालत का आयोजन किया गया है। जिसके लिए जिला न्यायालय अंबाला में तथा सब डिवीजन नारायणगढ़ में श्री अरविंद बंसल, अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, श्री प्रशांत राणा, अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश व प्रिंसिपल जज फैमिली कोर्ट, श्री मंजीत पाल, सिविल जज,श्री ध्रुव सैनी, सिविल जज, सुश्री श्रेया बंसल, सिविल जज, अंबाला व डॉ जितेंद्र कुमार,सिविल जज नारायणगढ़ की कुल 6 बेंचों का गठन किया गया था। लोक अदालत में वैवाहिक एव पारिवारिक मामले के  186 मामले आपराधिक के 997 मामले, दीवानी (सिविल)  2609 मामले एव बैंक रिकवरी के 1056, एनआईए एक्ट 666 इत्यादि के साथ साथ अन्य मामले भी रखे गए थे, और जिनमें 15974 मामलों का निपटारा किया गया, जिसमें कुल 41081773 राशि का भुगतान किया गया ।


    इस कड़ी में जिला न्यायालय में हेल्प डेस्क भी स्थापित किया गया है ताकि लोगों तक इसकी अधिक से अधिक जानकारी पहुँच सके और ज्यादा से ज्यादा लोग इस लोक अदालत का फायदा ले सकें। अधिक जानकारी के लि. हेल्पलाइन नं- 0171-2532142 व 9991112060 नालसा हेल्पलाइन नंबर 15100 पर संपर्क किया जा सकता है।

  • download - 2026-05-09T192831.958.jpg

    बैंक खाता फ्रीज करने पर पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट सख्त: मामूली लेनदेन पर पूरा अकाउंट बंद करना गैरकानूनी

    अभिकान्त, 09 मई हरियाणा : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने बैंक खातों को फ्रीज करने की प्रक्रिया को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और राहतकारी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल मामूली संदिग्ध लेनदेन के आधार पर किसी भी व्यक्ति का पूरा बैंक खाता बंद कर देना पूरी तरह से गैरकानूनी और मनमाना कदम है।

    इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस जगमोहन बंसल की बेंच ने एचडीएफसी बैंक को आदेश दिया है कि वह याचिकाकर्ता का खाता तुरंत दोबारा सक्रिय करे। कोर्ट ने यह सख्त टिप्पणी त्रिपत जीत सिंह द्वारा दायर की गई याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिनका खाता महज 5 हजार रुपए की एक संदिग्ध एंट्री के बाद बैंक ने फ्रीज कर दिया था।

    अदालत ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ कोई आधिकारिक एफआईआर दर्ज नहीं है और न ही किसी मजिस्ट्रेट का ऐसा कोई आदेश प्राप्त हुआ है, तो बैंक अपनी मर्जी से किसी का खाता बंद नहीं कर सकता। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया था कि बैंक ने उन्हें बिना किसी पूर्व सूचना के कार्रवाई की, जबकि उनका किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी या आपराधिक मामले से कोई लेना-देना नहीं था।

    हाईकोर्ट ने कहा कि 5 हजार रुपए जैसे छोटे लेनदेन के लिए पूरे खाते की पहुंच रोकना न्यायोचित नहीं है और ऐसी कार्रवाई कानून के तय मानकों के खिलाफ है। इस फैसले से उन लाखों खाताधारकों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है जिनके खाते अक्सर छोटी तकनीकी या संदिग्ध वजहों से बिना सूचना के बंद कर दिए जाते हैं।

    #HighCourtDecision #BankAccountFreeze #HDFCBank #JusticeJagmohanBansal #LegalNews #PunjabHaryanaHighCourt #BankingLaw #ConsumerRights #BankingUpdate #IndiaLegal #Danikkhabar.

  • download - 2026-04-26T165541.101.jpg

    अवैध खनन पर हाई कोर्ट सख्त: पंजाब सरकार को तीन हफ्ते में दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई करने के दिए निर्देश

    अभिकान्त, 26 अप्रैल पंजाब : पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने रावी और सतलुज दरियाओं में जारी अवैध खनन के मामले को गंभीरता से लेते हुए पंजाब सरकार को सख्त आदेश जारी किए हैं। माननीय अदालत ने स्पष्ट किया है कि प्रदेश के प्राकृतिक संसाधनों के साथ हो रहे खिलवाड़ को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और सरकार को अगले तीन सप्ताह के भीतर उन सभी जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी होगी, जिनकी नाक के नीचे यह अवैध कारोबार फल-फूल रहा है। यह आदेश ड्रोन सर्वे की एक विस्तृत रिपोर्ट के आधार पर दिया गया है, जिसने दरियाई क्षेत्रों में हो रही अवैध खुदाई की पोल खोल कर रख दी है।

    कोर्ट में पेश की गई ड्रोन सर्वे रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ है कि पंजाब में कई स्थानों पर निर्धारित और स्वीकृत क्षेत्र की सीमाओं से बाहर जाकर बड़े पैमाने पर खुदाई की गई है। इस अवैध गतिविधियों के कारण न केवल पर्यावरण का संतुलन बिगड़ रहा है, बल्कि राज्य सरकार को राजस्व के रूप में भी भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है। हाई कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि बिना विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत के इतने बड़े स्तर पर निर्धारित क्षेत्र से बाहर खनन संभव नहीं है।

    अदालत ने सरकार को आदेश दिया है कि वह इस मामले में संलिप्त अधिकारियों की पहचान करे और उनके विरुद्ध की गई कार्रवाई की रिपोर्ट अगली सुनवाई तक प्रस्तुत करे। इस फैसले के बाद राज्य के खनन विभाग और प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा हुआ है।

    #PunjabNews #HighCourt #IllegalMining #RaviRiver #SutlejRiver #PunjabGovernment #EnvironmentalProtection #DainikKhabar #LegalNews #ActionAgainstCorruption

  • punjab_and_haryana_high_court.jpg

    चंडीगढ़ डड्डूमाजरा डंपिंग ग्राउंड: कोर्ट ने सफाई की नई समय सीमा तय की, प्रशासन को मई तक का समय मिला

    चंडीगढ़, 18 अप्रैल (अन्‍नू): चंडीगढ़ के डड्डूमाजरा डंपिंग ग्राउंड को पूरी तरह साफ करने का काम एक बार फिर टल गया है। यूटी प्रशासन ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट को बताया है कि बेमौसम बारिश की वजह से काम में देरी हुई है, इसलिए अब सफाई पूरी करने की नई समय सीमा मई के पहले सप्ताह तक तय की गई है। इससे पहले प्रशासन ने अप्रैल के पहले सप्ताह तक का वादा किया था। मामले की अगली सुनवाई अब मई के पहले सप्ताह में होगी।


    दस्तावेजों में गड़बड़ी के आरोप

    सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने अदालत में शिकायत की कि प्रशासन द्वारा जमा किए गए दस्तावेजों में गलत जानकारी दी गई है और फाइलों में हेराफेरी की गई है। उन्होंने रिकॉर्ड के जरिए दिखाया कि समय-समय पर पेश की गई रिपोर्टों में विरोधाभास है। मुख्य न्यायाधीश शील नागू ने इन आरोपों को काफी गंभीर माना है और सभी पक्षों को इन दस्तावेजों की जांच करने के निर्देश दिए हैं।


    सिर्फ पुराने कचरे को हटाने का काम बाकी

    प्रशासन के वकील ने अदालत को भरोसा दिलाया कि डड्डूमाजरा में अब कोई नया कचरा नहीं डाला जा रहा है, केवल पुराने कचरे के ढेर को हटाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मौसम की रुकावटों के कारण 30 अप्रैल का लक्ष्य पूरा नहीं हो सका, इसलिए थोड़ा और समय मांगा गया है।


    लोगों की परेशानी का सबब बना डंपिंग ग्राउंड

    डड्डूमाजरा में कचरे के पहाड़, बदबू और प्रदूषण के कारण स्थानीय लोग लंबे समय से परेशान हैं। इसी समस्या को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी। अब कोर्ट की सख्ती के बाद प्रशासन ने मई तक काम पूरा करने का नया आश्वासन दिया है। बार-बार समय सीमा बढ़ाने के कारण प्रशासन के दावों पर सवाल उठ रहे हैं।



    #ChandigarhNews #DaduMajra #DumpingGround #HighCourt #Environment #WasteManagement #CivicIssues #DanikKhabar

  • WhatsApp Image 2026-04-16 at 2.06.36 PM.jpg
    16/04/26 |

    चंडीगढ़ कोर्ट का बड़ा फैसला: सड़क हादसे में जान गंवाने वाले व्यक्ति के परिवार को मिलेगा ₹44 लाख का मुआवजा

    अभिकान्त, 16 अप्रैल, चंडीगढ़ : चंडीगढ़ जिला अदालत ने अक्टूबर 2022 में हुए एक दुखद सड़क हादसे के मामले में पीड़ित परिवार के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने माना कि यह दुर्घटना पूरी तरह से कार चालक की तेज रफ्तार और लापरवाही का नतीजा थी। न्यायाधीश ने मृतक के परिवार की आर्थिक स्थिति और निर्भरता को देखते हुए ₹43.88 लाख की मुआवजा राशि तय की है। खास बात यह है कि इस राशि पर घटना की तारीख से भुगतान होने तक 7.5% वार्षिक ब्याज भी देय होगा, जिससे कुल सहायता राशि में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी।



    सेक्टर-31/32 लाइट प्वाइंट पर हुआ था दर्दनाक हादसा

    यह मामला 20 अक्टूबर 2022 का है, जब महेश चंद नामक व्यक्ति अपने एक्टिवा स्कूटर पर सवार होकर घर लौट रहे थे। जैसे ही वह सेक्टर-31/32 के लाइट प्वाइंट के पास पहुंचे, एक अनियंत्रित और तेज रफ्तार इनोवा कार ने उनके स्कूटर को जोरदार टक्कर मार दी। चश्मदीदों के अनुसार, टक्कर इतनी भयानक थी कि कार महेश चंद को काफी दूर तक घसीटते हुए ले गई। गंभीर रूप से घायल महेश को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ उपचार के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया।


    साक्ष्यों और गवाहों ने तय की ड्राइवर की संलिप्तता

    अदालत में सुनवाई के दौरान गवाहों के बयान और पुलिस की एफआईआर (FIR) को अहम आधार माना गया। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि कार चालक ने न तो सावधानी बरती और न ही टक्कर से पहले हॉर्न बजाया। ड्राइवर की ओर से अदालत में कोई ठोस बचाव पेश नहीं किया जा सका और न ही वह गवाहों के बयानों को चुनौती दे पाया। साक्ष्यों से यह पूरी तरह साबित हो गया कि मृतक की इस दुर्घटना में कोई गलती नहीं थी और वह नियमों का पालन करते हुए वाहन चला रहे थे।



    बीमा कंपनी की जिम्मेदारी और मुआवजे का आधार

    मुआवजे के भुगतान को लेकर कोर्ट ने बीमा कंपनी को उत्तरदायी ठहराया है। चूंकि हादसे के समय कार का बीमा वैध था और ड्राइवर के पास सही लाइसेंस मौजूद था, इसलिए अदालत ने बीमा कंपनी की उन दलीलों को खारिज कर दिया जिनमें वह जिम्मेदारी से बचने की कोशिश कर रही थी। कोर्ट ने माना कि महेश चंद अपने परिवार के एकमात्र कमाऊ सदस्य थे, और उनकी असामयिक मृत्यु से परिवार के सामने गहरा आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। इसी को आधार बनाकर आय और उम्र के हिसाब से राशि निर्धारित की गई।


    परिवार के सदस्यों के बीच राशि का बंटवारा

    अदालत ने पीड़ित परिवार के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए मुआवजे की राशि के वितरण का स्पष्ट खाका तैयार किया है। कुल राशि का 60 प्रतिशत हिस्सा मृतक की पत्नी सजना को दिया जाएगा। वहीं, उनके दो बच्चों, जैश्री और राहुल के भविष्य के लिए 15-15 प्रतिशत हिस्सा तय किया गया है। मृतक के पिता फूल चंद को कुल राशि का 10 प्रतिशत मिलेगा। अदालत ने निर्देश दिए हैं कि यह पूरी राशि सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में जमा की जाए ताकि उन्हें किसी बिचौलिये का सामना न करना पड़े।




    #ChandigarhNews #CourtVerdict #RoadAccidentCompensation #JusticeForVictims #LegalUpdate #ChandigarhDistrictCourt #InsuranceClaim #RoadSafety #HaryanaNews

  • download - 2026-04-08T155539.961.jpg

    पंजाब हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: अब क्लर्क से सचिव तक एक समान DA; 7.5 लाख कर्मचारियों-पेंशनर्स को राहत।

    अभिकान्त, 08 अप्रैल पंजाब : पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने आज पंजाब सरकार के लाखों कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को बड़ी राहत देते हुए एक क्रांतिकारी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट आदेश जारी किया है कि राज्य के सभी सरकारी कर्मचारियों को आईएएस (IAS), आईपीएस (IPS), आईएफएस (IFS) और न्यायिक अधिकारियों के समान ही महंगाई भत्ता (DA) दिया जाए। इस फैसले से राज्य के प्रशासनिक ढांचे में व्याप्त भत्ते के भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।

    मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सरकार के उस मौजूदा ढांचे पर कड़ा रुख अपनाया, जिसमें उच्च श्रेणी के अधिकारियों और अन्य सरकारी कर्मचारियों के महंगाई भत्ते में असमानता थी। अदालत ने निर्देश दिया कि महंगाई का प्रभाव सभी श्रेणियों के कर्मचारियों पर समान होता है, इसलिए भत्ते के निर्धारण में अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच कोई अंतर नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने सरकार को पाबंद किया है कि वह 30 जून 2026 तक सभी पात्र कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को बढ़े हुए डीए (DA) का भुगतान सुनिश्चित करे।

    सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पंजाब में वर्तमान में 3.5 लाख से अधिक नियमित सरकारी कर्मचारी कार्यरत हैं, जबकि पेंशनभोगियों की संख्या 4 लाख से अधिक है। हाईकोर्ट के इस आदेश से लगभग 7.5 लाख परिवारों को सीधे तौर पर आर्थिक लाभ होगा। लंबे समय से कर्मचारी संगठन महंगाई भत्ते की किस्तों और बकाया राशि को लेकर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे, ऐसे में न्यायिक हस्तक्षेप ने उनकी मांगों को एक मजबूत आधार प्रदान किया है।

    अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 2 जुलाई 2026 के लिए तय की है। तब तक सरकार को भुगतान की रिपोर्ट पेश करनी होगी। अब देखना यह होगा कि पंजाब सरकार इस भारी वित्तीय बोझ को वहन करने के लिए क्या कदम उठाती है। वित्त विभाग के सूत्रों का कहना है कि इस फैसले से सरकारी खजाने पर करोड़ों रुपये का अतिरिक्त भार पड़ेगा। हालांकि, कर्मचारी संगठनों ने हाईकोर्ट के इस फैसले का स्वागत करते हुए इसे 'समान काम, समान न्याय' की जीत बताया है।

    #PunjabGovernment #HighCourtOrder #DearnessAllowance #DANews #GovernmentEmployees #JusticeForEmployees #PunjabNews #PensionersBenefit #EqualityInPay #Danikkhabar

  • download - 2026-03-24T162737.953.jpg

    सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: महिला सैन्य अफसरों को पूर्ण पेंशन का हक, भेदभाव खत्म करने का आदेश

    ए के वत्स, 24 मार्च हरियाणा : भारतीय न्यायपालिका ने सशस्त्र बलों में लैंगिक समानता की दिशा में आज एक और मील का पत्थर स्थापित किया है। उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को एक युगांतकारी निर्णय सुनाते हुए भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना में शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) के तहत सेवा दे चुकीं महिला अधिकारियों को पूरी पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ देने का आदेश दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि जिन महिला अधिकारियों को केवल 'सिस्टम' के भेदभाव के कारण परमानेंट कमीशन (PC) से वंचित रखा गया, उन्हें उनके संवैधानिक अधिकारों से दूर नहीं रखा जा सकता।

    20 साल की सेवा मानकर मिलेगी एकमुश्त राहत: अदालत ने उन महिला अधिकारियों के लिए विशेष 'वन-टाइम' राहत की घोषणा की है, जो परमानेंट कमीशन न मिलने के कारण पहले ही सेवा मुक्त हो चुकी थीं। कोर्ट ने आदेश दिया कि ऐसी अधिकारियों की सेवा अवधि को काल्पनिक रूप से 20 वर्ष (पेंशन के लिए अनिवार्य न्यूनतम अवधि) पूरा माना जाए। इससे वे सभी महिलाएं अब पूर्ण पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य पूर्व-सैनिक लाभों की हकदार होंगी, जिन्हें 10 या 14 साल की सेवा के बाद बिना किसी वित्तीय सुरक्षा के घर भेज दिया गया था।

    'व्यवस्थागत भेदभाव' पर कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने सशस्त्र बलों के भीतर मौजूद गहरे ढांचागत भेदभाव पर कड़ा प्रहार किया। पीठ ने कहा कि महिलाओं को परमानेंट कमीशन से बाहर रखना उनकी पेशेवर क्षमता या योग्यता की कमी नहीं थी, बल्कि यह उस भेदभावपूर्ण व्यवस्था का परिणाम था जो दशकों से चली आ रही थी। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि देश की रक्षा में महिलाओं का योगदान पुरुषों के बराबर है और उनके साथ सेवा की शर्तों में किसी भी प्रकार का पक्षपात बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

    क्या था पूरा विवाद? यह कानूनी लड़ाई उन महिला अधिकारियों द्वारा शुरू की गई थी जो एसएससी के तहत भर्ती हुई थीं। नियमों के मुताबिक, एसएससी अधिकारियों का कार्यकाल 10 साल का होता है, जिसे अधिकतम 4 साल तक बढ़ाया जा सकता है। इसके बाद परमानेंट कमीशन (PC) मिलने पर ही वे पेंशन के हकदार होते हैं, अन्यथा उन्हें खाली हाथ सेवा छोड़नी पड़ती है। कई योग्य महिला अधिकारियों ने आरोप लगाया था कि उन्हें पीसी देने में जानबूझकर बाधाएं उत्पन्न की गईं। आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल (AFT) से होते हुए यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, जहाँ आज महिलाओं की जीत हुई है।

    #SupremeCourtIndia #WomenInArmedForces #GenderEquality #IndianArmy #IndianNavy #IndianAirForce #JusticeForWomen #PensionRights #LegalVictory #NariShakti #BreakingNewsIndia #Danikkhabar

  • download - 2026-03-14T134619.716.jpg
    14/03/26 |

    पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट का अहम फैसला: मनी लॉन्ड्रिंग मामले में 73 वर्षीय दोषी को दी सशर्त जमानत, 20 पौधे लगाने का आदेश

    चंडीगढ़, 14 मार्च 2026: पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में सजा काट…..

  • download - 2026-03-14T123942.538.jpg
    14/03/26 |

    कैथल अदालत का सख्त फैसला : रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़े गए ASI बलविन्द्र सिंह को 4 वर्ष का कारावास

    हरियाणा, 14  मार्च  (अभी) : भ्रष्टाचार के एक मामले में माननीय अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, कैथल की अदालत द्वारा आरोपी सहायक उप-निरीक्षक (ASI) बलविन्द्र सिंह, जिला कैथल को दोषी ठहराते हुए भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 तथा धारा 13(1)(b) सहपठित धारा 13(2) के तहत 4 वर्ष के कठोर कारावास एवं 50,000/- रुपये के जुर्माने से दंडित किया गया है। जुर्माना अदा न करने की स्थिति में आरोपी को 5 माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।

    प्रकरण के अनुसार शिकायतकर्ता संदीप कुमार ने भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, अम्बाला को दी गई शिकायत में आरोप लगाया था कि उसकी माता कृष्णा देवी के विरुद्ध दर्ज मुकदमा संख्या 284/2023 (लड़ाई-झगड़े का मामला), जिसकी जांच पुलिस चौकी भागल में चल रही थी, में गिरफ्तारी का दबाव बनाकर आरोपी द्वारा 60,000 रुपये रिश्वत वसूली गई। इसके अतिरिक्त, इसी मामले में शिकायतकर्ता के पड़ोसी जयपाल के पुत्रों शेखर व अमन तथा शिकायतकर्ता का नाम केस से निकालने के एवज में प्रत्येक व्यक्ति से 50-50 हजार रुपये की रिश्वत तय की गई और 10,000 रुपये अग्रिम रिश्वत की मांग की जा रही थी।

    उक्त शिकायत पर कार्रवाई करते हुए भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, अम्बाला की टीम ने आरोपी ASI बलविन्द्र सिंह को शिकायतकर्ता से 10,000 रुपये रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार किया था। इस संबंध में आरोपी के विरुद्ध अभियोग संख्या 30 दिनांक 12.12.2023 के तहत धारा 7, 13(1)(b) सहपठित धारा 13(2) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 तथा धारा 384 आईपीसी के अंतर्गत थाना भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो, अम्बाला में मामला दर्ज किया गया था। जांच पूर्ण होने उपरांत आरोपी के विरुद्ध दिनांक 08.02.2024 को माननीय न्यायालय, कैथल में चालान प्रस्तुत किया गया, जिस पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने आरोपी को दोषी करार देते हुए उपरोक्त सजा सुनाई है।

    #KaithalCourt #AntiCorruptionBureau #HaryanaPolice #JusticeServed #BriberyCase #CorruptionFreeHaryana #LegalVerdict #ASIArrested #HaryanaNews #ZeroTolerance #danikkhabar

  • download - 2026-01-13T141739.198.jpg

    'कुत्तों को खिलाना है तो घर ले जाएं': आवारा कुत्तों के आतंक पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, अब काटने पर राज्य सरकारों को देना होगा भारी मुआवजा

    नई दिल्ली, 13 जनवरी (अभी) : देश के विभिन्न हिस्सों, विशेषकर दिल्ली-एनसीआर में आवारा कुत्तों के बढ़ते हमलों और उससे होने वाली मौतों पर सुप्रीम कोर्ट ने आज एक ऐतिहासिक और कड़ा रुख अपनाया है। 13 जनवरी 2026 को हुई सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय की जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने स्पष्ट कर दिया कि अब मानवीय सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा। अदालत ने कड़ी चेतावनी जारी करते हुए आदेश दिया है कि यदि किसी बच्चे या बुजुर्ग की कुत्ते के काटने से मौत होती है या वह जख्मी होता है, तो संबंधित राज्य सरकार इसके लिए उत्तरदायी होगी और उसे पीड़ित परिवार को भारी मुआवजा देना होगा।

    सुनवाई के दौरान अदालत की तल्खी उस समय और बढ़ गई जब आवारा कुत्तों को खाना खिलाने वाले संगठनों और व्यक्तियों की जिम्मेदारी का मुद्दा उठा। जस्टिस विक्रम नाथ ने कड़े शब्दों में कहा कि जो लोग कुत्तों को सड़कों पर खाना खिलाते हैं, उन्हें उनकी जवाबदेही भी लेनी होगी। उन्होंने सुझाव देते हुए कहा कि "एक काम करें, इन कुत्तों को अपने घर ले जाएं, उन्हें सड़कों पर आवारा भटकने के लिए क्यों छोड़ा जाता है जहाँ वे लोगों को डराते हैं और उन पर हमला करते हैं?" जब वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने इसे एक भावनात्मक मुद्दा बताया, तो बेंच ने पलटवार करते हुए कहा कि यह भावुकता केवल जानवरों के प्रति ही क्यों दिखाई देती है, इंसानों की सुरक्षा का क्या?

    उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले 7 नवंबर 2025 को एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया था, जिसमें अस्पतालों, स्कूलों, बस स्टैंडों और रेलवे स्टेशनों जैसे सार्वजनिक स्थानों से आवारा कुत्तों को पूरी तरह हटाने का निर्देश दिया गया था। आज की सुनवाई में कोर्ट ने अधिकारियों की निष्क्रियता पर भी नाराजगी जताई और कहा कि प्रशासन की ढिलाई के कारण ही यह समस्या आज विकराल रूप ले चुकी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्थलों पर आम नागरिकों का सुरक्षित आवाजाही का अधिकार सर्वोपरि है और किसी भी प्रकार की फीडिंग या पशु प्रेम को इंसानी जान की कीमत पर बढ़ावा नहीं दिया जा सकता।

    #SupremeCourtIndia #StrayDogTerror #JusticeForVictims #DogBiteCompensation #PublicSafety #StrayDogMenace #JudicialActivism #HumanRightsIndia #SafetyFirst #StateGovernmentLiability #DogBitePrevention #DelhiNCRNews #UrbanSafety #ChildSafety #LegalUpdate2026 #StrayDogLaw #Accountability #DogLoversVsSafety #IndianCourts #RightToLife #BreakingNewsIndia #CivicIssues #SafetyInPublicSpaces #DogAttackCompensation #JusticeSystem #HumanVsAnimalConflict #UrbanGovernance

  • Untitled-2.jpg

    राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन की बड़ी सफलता: 8 महीनों में उपभोक्ताओं को वापस दिलाए 45 करोड़ रूपए

    आरएस अनेजा, 27 दिसम्बर नई दिल्ली - भारत सरकार के उपभोक्ता मामले विभाग की एक प्रमुख पहल, राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन (एनसीएच), देश भर में उपभोक्ताओं की शिकायतों के प्रभावी, समयबद्ध और मुकदमेबाजी से पहले निवारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

    25 अप्रैल से 26 दिसंबर 2025 तक आठ महीने की अवधि के दौरान, हेल्पलाइन ने 31 क्षेत्रों में राशि वापिस दिलवाने के दावों से संबंधित 67,265 उपभोक्ता शिकायतों का समाधान करते हुए 45 करोड़ रुपये की राशि के वापिस दिलवाई है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत मुकदमेबाजी से पहले, एनसीएच विवादों के त्वरित, किफायती और सौहार्दपूर्ण समाधान को सक्षम बनाती है जिससे उपभोक्ता आयोगों पर बोझ कम होता है।

    ई -कॉमर्स क्षेत्र में शिकायतों और वापिस दिलवाई गई राशि की मात्रा और संख्या सबसे अधिक दर्ज की गई जिसमें 39,965 शिकायतों के परिणामस्वरूप 32 करोड़ रुपये की राशि वापिस दिलवाई गई। इसके बाद यात्रा और पर्यटन क्षेत्र का स्थान रहा जिसमें 4,050 शिकायतें दर्ज की गई और 3.5 करोड़ रुपये की राशि वापिस दिलवाई गई।

    ई-कॉमर्स क्षेत्र से राशि वापिस दिलवाने से संबंधित शिकायतें देश के सभी हिस्सों से प्राप्त हुई जिनमें प्रमुख महानगरों से लेकर दूरस्थ और कम आबादी वाले क्षेत्र भी शामिल हैं। यह राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन की राष्ट्रव्यापी पहुंच, सुगमता और प्रभावशीलता को दर्शाता है।

    ऐसे पहुंचे उपभोक्ता हेल्पलाइन तक

    यह हेल्पलाइन देशभर के उपभोक्ताओं के लिए है । उपभोक्ता टोल-फ्री नंबर 1915 के माध्यम से 17 भाषाओं में अपनी शिकायतें दर्ज करा सकते हैं

     व्हाट्सएप (8800001915), एसएमएस (8800001915), ईमेल (nch-ca[at]gov[dot]in), एनसीएच ऐप, वेब पोर्टल ( www.consumerhelpline.gov.in ) और उमंग ऐप शामिल हैं जो उपभोक्ताओं को लचीलापन और सुविधा प्रदान करते हैं।

  • 1000325096.jpg

    मद्रास हाईकोर्ट के जज जी.आर. स्वामीनाथन के खिलाफ प्रियंका वाड्रा और 100 विपक्षी सांसदों द्वारा महाभियोग प्रस्ताव।

    कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा, डीएमके (DMK) की कनिमोझी, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और अन्य विपक्षी नेताओं सहित 100 से अधिक लोकसभा सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को एक नोटिस सौंपा है। इस नोटिस में जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन को उनके पद से हटाने (Removal Motion) की मांग की गई है।

    Justice Swaminathan ने 1–3 दिसंबर 2025 को एक आदेश दिया था, जिसमें उन्होंने Thirupparankundram पहाड़ी पर स्थित Subramaniya Swamy Temple — जो एक पुराना मंदिर है — के “दीपथून” (stone pillar / दीप स्तंभ) पर Karthigai Deepam (पारंपरिक दीपोत्सव) के लिए दीया जलाने की अनुमति दी थी।

    विपक्षी सांसदों ने जस्टिस स्वामीनाथन पर गंभीर आरोप लगाए हैं:

    उनका कहना है कि जज निष्पक्ष नहीं हैं और उनके फैसले एक 'विशेष राजनीतिक विचारधारा' से प्रेरित हैं, जो संविधान के धर्मनिरपेक्ष (secular) सिद्धांतों के खिलाफ है ।

    नोटिस में आरोप लगाया गया है कि जज ने एक वरिष्ठ वकील और एक विशेष समुदाय के वकीलों के प्रति अनुचित तरफदारी (favouritism) दिखाई है ।

    कहा जा रहा है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता को खतरा है, क्योंकि एक राजनैतिक दल (INDIA ब्लॉक) –- चुनावी राजनीति के मद्देनज़र — जज को हटा रहे हैं।

    तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी DMK के साथ यह प्रस्ताव भी जुड़ा है, और कहा जा रहा है कि यह एक चुनावी चाल है (क्यूंकि अगले साल विधानसभा चुनाव है)।

    इसके अलावा, कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या सिर्फ एक धार्मिक-संवेदनशील मामले में दिए गए आदेश को महाभियोग के लिए पर्याप्त समझा जाना चाहिए — यानी, क्या यह “दुराचार / misconduct” है या सिर्फ एक विवादास्पद फैसला (judicial disagreement) है।

    #ImpeachmentMotion #MadrasHighCourt #JudgeGRSwaminathan #PriyankaVadra #OppositionMPs #LegalNews #IndianPolitics #Judiciary #ParliamentaryAction #PoliticalDrama #JusticeSystem #CourtNews #Governance #LegalUpdate #OppositionUnity #PoliticalAccountability #CurrentAffairs #SocialJustice #IndiaPolitics