निजी स्कूलों को दिल्ली हाई कोर्ट से बड़ी राहत: नए सत्र में फीस बढ़ाने के लिए शिक्षा निदेशालय की मंजूरी जरूरी नहीं

अभिकान्त, 23 मई नई दिल्ली :  दिल्ली हाई कोर्ट ने राष्ट्रीय राजधानी के निजी स्कूलों (प्राइवेट स्कूल्स) को एक बहुत बड़ी और महत्वपूर्ण राहत दी है। अदालत ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में अपनी फीस बढ़ाने के लिए निजी स्कूलों को शिक्षा निदेशालय (DoE) से पहले से अनुमति या मंजूरी लेने की कोई कानूनी आवश्यकता नहीं है। इस बड़े निर्णय के साथ ही माननीय उच्च न्यायालय ने शिक्षा निदेशालय द्वारा पूर्व में जारी किए गए उन कई सर्कुलरों (दिशानिर्देशों) को पूरी तरह से रद कर दिया है, जिनके तहत स्कूलों के लिए फीस वृद्धि से पहले निदेशालय की पूर्व अनुमति को अनिवार्य बनाया गया था।

यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभरानी ने 120 पन्नों का एक बेहद विस्तृत और व्यापक निर्णय जारी किया। जस्टिस भंभरानी ने अपने फैसले में कानूनी प्रावधानों की व्याख्या करते हुए कहा कि 'दिल्ली स्कूल शिक्षा अधिनियम' (Delhi School Education Act) की धारा 17(3) के अंतर्गत निजी स्कूलों पर केवल इतनी ही कानूनी बाध्यता या दायित्व है कि वे नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले अपनी प्रस्तावित फीस संरचना (फीस स्ट्रक्चर) का पूरा विवरण शिक्षा निदेशालय के पास जमा यानी दाखिल कर दें। कानून के अनुसार सत्र शुरू होने से पहले केवल जानकारी देना ही पर्याप्त है, उसके लिए किसी औपचारिक मंजूरी का इंतजार करना जरूरी नहीं है।

हालांकि, अदालत ने अपने इस फैसले में एक महत्वपूर्ण तकनीकी अंतर को भी पूरी तरह स्पष्ट किया है। हाई कोर्ट ने साफ किया है कि यह छूट केवल नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने से पहले की जाने वाली फीस वृद्धि पर ही लागू होगी। यदि कोई स्कूल एक बार शैक्षणिक सत्र शुरू हो जाने के बाद, यानी सत्र के बीच में किसी भी समय फीस बढ़ाने का फैसला करता है, तो ऐसी स्थिति में उसके लिए शिक्षा निदेशालय से पूर्व अनुमति लेना पूरी तरह से आवश्यक और अनिवार्य होगा। अदालत का यह फैसला दिल्ली के निजी स्कूल संचालकों के लिए जहां एक बड़ी राहत लेकर आया है, वहीं इससे आने वाले दिनों में फीस निर्धारण की प्रक्रिया में एक नया प्रशासनिक बदलाव देखने को मिलेगा।

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