देवभूमि की 'हरियाली' पर संकट: सैटेलाइट डेटा ने दी उत्तराखंड के जंगलों में बदलाव की चेतावनी
आरएस अनेजा, 9 फरवरी नैनीताल - हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड के जंगलों और घास के मैदानों की सेहत अब पहले जैसी नहीं रही। आधुनिक सैटेलाइट तकनीक और डेटा विश्लेषण से यह खुलासा हुआ है कि पिछले दो दशकों में राज्य की वनस्पतियों के व्यवहार और घनत्व में चिंताजनक बदलाव आए हैं। आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज (ARIES), नैनीताल के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक शोध में यह बात सामने आई है कि जलवायु परिवर्तन और मानवीय हस्तक्षेप हिमालयी इकोसिस्टम को गहराई से प्रभावित कर रहे हैं।
22 सालों का डिजिटल लेखा-जोखा
ARIES के वैज्ञानिक डॉ. उमेश डुमका के नेतृत्व में शोधकर्ताओं की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने वर्ष 2001 से 2022 तक के आंकड़ों का विश्लेषण किया। इस अध्ययन के लिए Google Earth Engine (GEE) जैसे शक्तिशाली वैश्विक प्लेटफ़ॉर्म का उपयोग किया गया, जिसने दो दशकों के विशाल सैटेलाइट डेटा को प्रोसेस करना संभव बनाया।
एनडीवीआई : वनस्पतियों को मापने का पैमाना
शोधकर्ताओं ने वनस्पतियों के स्वास्थ्य को मापने के लिए नॉर्मलाइज़्ड डिफरेंस वेजिटेशन इंडेक्स (NDVI) और एन्हांस्ड वेजिटेशन इंडेक्स (EVI) का सहारा लिया।
उच्च NDVI: घने जंगलों, स्वस्थ फसलों और आर्द्रभूमि को दर्शाता है।
निम्न NDVI: चट्टानों, रेत, बर्फ या बंजर भूमि का संकेत देता है।
अध्ययन के अनुसार, उत्तराखंड में मानसून के ठीक बाद (Post-monsoon) हरियाली अपने चरम पर होती है, जबकि मानसून से पहले (Pre-monsoon) यह सबसे कम स्तर पर होती है। लेकिन पिछले 22 वर्षों के रुझान बताते हैं कि यह प्राकृतिक चक्र अब डगमगा रहा है।
बदलते मिजाज के पीछे के मुख्य कारण
अध्ययन में उन कारकों की पहचान की गई है जो उत्तराखंड की प्राकृतिक संपदा को नुकसान पहुँचा रहे हैं:
अंधाधुंध शहरीकरण: शहरों के विस्तार और बुनियादी ढांचे के विकास के कारण हरित क्षेत्र में कमी आई है।
खेती का विस्तार और पेड़ों की कटाई: कृषि भूमि की बढ़ती मांग और अवैध कटाई ने जंगलों के घनत्व को प्रभावित किया है।
बढ़ता प्रदूषण: इंडस्ट्रियल और शहरी स्रोतों से निकलने वाले प्रदूषण ने कुछ खास इलाकों में वनस्पतियों के विकास को धीमा कर दिया है।
जलवायु परिवर्तन: तापमान में वृद्धि और बारिश के बदलते पैटर्न ने पौधों की 'लचीलापन' (Resilience) क्षमता को कम कर दिया है।
खतरे की घंटी: क्यों है यह चिंताजनक?
हिमालयी इकोसिस्टम की यह संवेदनशीलता सीधे तौर पर लाखों लोगों के जीवन से जुड़ी है। वनस्पतियों में आने वाला कोई भी बड़ा बदलाव न केवल जैव विविधता को खतरे में डालता है, बल्कि जल स्रोतों के सूखने और प्राकृतिक आपदाओं (जैसे भूस्खलन और बाढ़) के जोखिम को भी कई गुना बढ़ा देता है।
"यह अध्ययन एक अर्ली-वार्निंग सिस्टम (पूर्व चेतावनी प्रणाली) की तरह है। यदि हम समय रहते अपनी नीतियों में बदलाव नहीं करते, तो हिमालयी संतुलन को फिर से बहाल करना नामुमकिन हो सकता है।" — डॉ. उमेश डुमका, प्रमुख शोधकर्ता, ARIES
#HimalayanGreenery #UttarakhandForests #SatelliteData #EnvironmentalThreat #ForestConservation #ClimateChangeAlert #SustainableFuture #IndiaEnvironment #ProtectGreenery #WildlifePreservation #SatelliteMonitoring #EcologicalCrisis #GreenSpaces #NatureConservation #SaveOurForests #Biodiversity #ForestHealth #ClimateAction #PreserveNature #EnvironmentalAwareness