पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: महज संदेह या अटकलों पर सरकारी अफसरों के खिलाफ नहीं हो सकती कार्रवाई

अभिकान्त, 15 जुलाई हरियाणा : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही तय करने और आपराधिक मामलों की जांच को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल संदेह, अनुमान या अटकलों के आधार पर किसी भी सरकारी अधिकारी के खिलाफ कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की जा सकती और न ही कोई दंडात्मक कार्रवाई शुरू की जा सकती है।

अदालत ने कहा कि किसी भी अधिकारी पर जिम्मेदारी तय करने के लिए उसके खिलाफ जानबूझकर किए गए कदाचार (Misconduct) या कर्तव्य में घोर लापरवाही के स्पष्ट, पुख्ता और ठोस साक्ष्य होना अनिवार्य है। जस्टिस नीरजा कुलसन की एकल पीठ ने वर्ष 2016 के रोहतक दुष्कर्म मामले में मुख्य आरोपी की अपील को स्वीकार करते हुए उसे संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया। इसके साथ ही, कोर्ट ने मामले की जांच से जुड़े पुलिस अधिकारियों की ओर से दायर तीन अलग-अलग याचिकाओं को भी मंजूर कर लिया और ट्रायल कोर्ट द्वारा उनके खिलाफ की गईं सभी प्रतिकूल टिप्पणियों को पूरी तरह निरस्त कर दिया।

यह पूरा मामला 23-24 सितंबर, 2016 की रात रोहतक में दर्ज हुई एक एफआईआर (FIR) से जुड़ा हुआ है, जिसमें एक महिला ने अपहरण और दुष्कर्म के गंभीर आरोप लगाए थे। इस मामले में रोहतक की अतिरिक्त सत्र अदालत (Additional Sessions Court) ने सितंबर 2018 में आरोपी को दोषी करार देते हुए 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इसके साथ ही, ट्रायल कोर्ट ने मामले की जांच करने वाले पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करते हुए उनके खिलाफ भी विभागीय व कानूनी कार्रवाई के कड़े निर्देश दिए थे।

हाईकोर्ट ने अपील पर सुनवाई के दौरान जब मामले के साक्ष्यों का दोबारा और गहराई से परीक्षण किया, तो पाया कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) द्वारा पेश किए गए सबूतों और बयानों में गंभीर विसंगतियां और विरोधाभास हैं। अदालत ने आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए सम्मान बरी कर दिया। अपने फैसले में हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:

"आपराधिक मामलों की सुनवाई के दौरान अदालतों को पीड़ित के प्रति संवेदनशील जरूर होना चाहिए, लेकिन देश के संविधान के तहत आरोपी को भी समान सुरक्षा और अधिकार प्राप्त हैं। किसी भी व्यक्ति को केवल संभावना, अनुमान या बेहद कमजोर साक्ष्यों के आधार पर गुनहगार नहीं ठहराया जा सकता। कानून का शासन केवल ठोस और विश्वसनीय प्रमाणों की मांग करता है।"

अदालत ने रिकॉर्ड का विश्लेषण करने के बाद पाया कि संबंधित जांच अधिकारियों का इस मामले में चालान पेश होने से काफी पहले ही तबादला (Transfer) हो चुका था। ऐसे में जांच में रह गई कथित कमियों के लिए उन अधिकारियों की सीधी जिम्मेदारी का कोई भी ठोस सबूत रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं था। इसके अलावा, ट्रायल कोर्ट के पूर्व आदेश पर दर्ज की गई एफआईआर की स्वतंत्र जांच में भी पुलिस अधिकारियों की किसी प्रकार की मिलीभगत या साक्ष्यों में हेरफेर का कोई प्रमाण नहीं मिला था, और जांच एजेंसी इस मामले में पहले ही कोर्ट में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर चुकी है।

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