सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: महिला सैन्य अफसरों को पूर्ण पेंशन का हक, भेदभाव खत्म करने का आदेश

ए के वत्स, 24 मार्च हरियाणा : भारतीय न्यायपालिका ने सशस्त्र बलों में लैंगिक समानता की दिशा में आज एक और मील का पत्थर स्थापित किया है। उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को एक युगांतकारी निर्णय सुनाते हुए भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना में शॉर्ट सर्विस कमीशन (SSC) के तहत सेवा दे चुकीं महिला अधिकारियों को पूरी पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभ देने का आदेश दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि जिन महिला अधिकारियों को केवल 'सिस्टम' के भेदभाव के कारण परमानेंट कमीशन (PC) से वंचित रखा गया, उन्हें उनके संवैधानिक अधिकारों से दूर नहीं रखा जा सकता।

20 साल की सेवा मानकर मिलेगी एकमुश्त राहत: अदालत ने उन महिला अधिकारियों के लिए विशेष 'वन-टाइम' राहत की घोषणा की है, जो परमानेंट कमीशन न मिलने के कारण पहले ही सेवा मुक्त हो चुकी थीं। कोर्ट ने आदेश दिया कि ऐसी अधिकारियों की सेवा अवधि को काल्पनिक रूप से 20 वर्ष (पेंशन के लिए अनिवार्य न्यूनतम अवधि) पूरा माना जाए। इससे वे सभी महिलाएं अब पूर्ण पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य पूर्व-सैनिक लाभों की हकदार होंगी, जिन्हें 10 या 14 साल की सेवा के बाद बिना किसी वित्तीय सुरक्षा के घर भेज दिया गया था।

'व्यवस्थागत भेदभाव' पर कोर्ट की कड़ी टिप्पणी: सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने सशस्त्र बलों के भीतर मौजूद गहरे ढांचागत भेदभाव पर कड़ा प्रहार किया। पीठ ने कहा कि महिलाओं को परमानेंट कमीशन से बाहर रखना उनकी पेशेवर क्षमता या योग्यता की कमी नहीं थी, बल्कि यह उस भेदभावपूर्ण व्यवस्था का परिणाम था जो दशकों से चली आ रही थी। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि देश की रक्षा में महिलाओं का योगदान पुरुषों के बराबर है और उनके साथ सेवा की शर्तों में किसी भी प्रकार का पक्षपात बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

क्या था पूरा विवाद? यह कानूनी लड़ाई उन महिला अधिकारियों द्वारा शुरू की गई थी जो एसएससी के तहत भर्ती हुई थीं। नियमों के मुताबिक, एसएससी अधिकारियों का कार्यकाल 10 साल का होता है, जिसे अधिकतम 4 साल तक बढ़ाया जा सकता है। इसके बाद परमानेंट कमीशन (PC) मिलने पर ही वे पेंशन के हकदार होते हैं, अन्यथा उन्हें खाली हाथ सेवा छोड़नी पड़ती है। कई योग्य महिला अधिकारियों ने आरोप लगाया था कि उन्हें पीसी देने में जानबूझकर बाधाएं उत्पन्न की गईं। आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल (AFT) से होते हुए यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, जहाँ आज महिलाओं की जीत हुई है।

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