26/03/26

भक्तिकालीन साहित्य भारतीय ज्ञान परम्परा की अमूल्य धरोहर: डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

अभिकान्त, 26 मार्च हरियाणा : हरियाणा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, पंचकूला तथा हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला (पंजाबी एवं डोगरी विभाग) द्वारा 24-25 मार्च को अकादमी भवन में अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में आज मुख्य अतिथि, प्रो. जगबीर सिंह, कुलाधिपति, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, अध्यक्ष, डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री, पूर्व कुलपति, केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला व कार्यकारी उपाध्यक्ष, अकादमी, विशेष अतिथि श्री मनजीत सिंह, सदस्य सचिव, अकादमी रहे।

 

भक्ति आंदोलन एवं गुरू रविदास जी विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन के प्रथम सत्र के अध्यक्ष के रूप में पधारे प्रो. रविन्दर सिंह, पंजाबी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली ने कहा कि इस सत्र के चारों शोध पत्रों में गुरु रविदास जी के योगदान का बहुआयामी विवेचन किया गया। संत कबीर ने निर्गुण और सगुण में कोई भेद स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा कि जो निर्गुण हैं वही सगुण भी है। शब्दों का विस्तार असीम है, लेकिन उनका अपना अलग महत्त्व भी है। मध्यकाल के भक्ति आंदोलन ने समाजिक-समरसता की स्थापना की थी। अद्वैत के व्यावहारिक रूप के हमारे समाज में कई धाराएं आईं। भक्त और गुरु में भेद करना भी समाज के हित में नहीं है। मार्क्सवादी दृष्टिकोण को तिलांजलि देने का समय आ गया है क्योंकि यह दृष्टिकोण एकांकी विचार का समर्थन करता है।

 

संगोष्ठी में पधारी डॉ. बरिंदर कौर, प्राचार्या, माता सुन्दरी कॉलेज, मानसा ने द्वितीय एवं अंतिम सत्र में अपने अध्यक्षीय संबोधन में आधुनिक तकनीक को ज्ञान परम्परा के साथ जोड़कर इसके उपयोग पर बल दिया। इसका गुलाम नहीं होना। लोक सम्मत पक्ष के साथ जुड़ना है। गुरु रविदास की वाणी अपने समाज के उज्ज्वल पक्षों के निर्माण की वकालत करती है। समाज के अंधेरे कोनों को ज्ञान के आलोक से रोशन करने का संदेश देती है।

 

अकादमी के सदस्य सचिव, मनजीत सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि अपने आराध्य के प्रतिपूर्ण निष्ठा का भाव ही भक्ति है। यह बात श्रीकृष्ण जी ने गीता में भी कही है। मीरा श्रीकृष्ण जी की भक्ति में इतनी डूब गई थी कि उन्हें यह भी नहीं पता था कि मैं मीरा हूँ। उनका मानना है कि जब तक मन है तो उस मन में मलिनता तो रहेगी ही। उनका कहना है कि रास्ता तो एक ही है पर विचार दो हैं: साकार और निराकार। अगर परमात्मा को पाना है तो अहम् की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।

 

अकादमी के कार्यकारी उपाध्यक्ष, डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने समापन सत्र में कहा कि मनुष्य की एकाधिकार की प्रवृत्ति समाज की समरसता में सबसे बड़ी बाधा है। भक्तिकाल के संत महात्मा भारतीय ज्ञान परम्परा की अमूल्य धरोहर हैं उन्हें हमें समग्र रूप में स्वीकार करते हुए उनके संदेश के अनुसार आचरण करना चाहिए। मध्यकालीन भक्ति आंदोलन भारतीय ज्ञान परम्परा की सनातन धारा का ही एक प्रबल प्रवाह था।

 

इस सत्र में प्रो. सरबजीत कौर, रमनदीप कौर, हंसराज, लखबीर सिंह, मंदीप सिंह व हरप्रीत सिंह ने अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। इस संगोष्ठी के ऑनलाइन मोड़ में 60 से अधिक विद्वानों ने शोध-पत्र प्रस्तुत किए तथा 15 पत्र ऑनलाइन पढ़े गए।

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