पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने पेश किया भारत का इनोवेटिव 'ग्रीन फाइनेंस' मॉडल
आरएस अनेजा, 24 अगस्त नई दिल्ली - पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने आज उलानबटार (मंगोलिया) में UNCCD (मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन) की 17वीं कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़ (CoP17) के दौरान 'स्वस्थ भूमि और सूखे से निपटने की क्षमता के लिए इनोवेटिव फाइनेंशियल मैकेनिज्म' पर हुई मंत्री-स्तरीय बातचीत में भूमि बहाली और सूखे से निपटने की क्षमता के लिए भारत के इनोवेटिव और विविध फाइनेंसिंग ढांचे पर प्रकाश डाला।
भूमि बहाली में लगातार निवेश की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए श्री यादव ने कहा, "भूमि बहाली कोई खर्च नहीं है, बल्कि भोजन, पानी, जैव विविधता, आजीविका और लंबे समय तक टिके रहने की क्षमता में एक निवेश है"। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि बड़े पैमाने पर मरुस्थलीकरण, भूमि के क्षरण और सूखे की समस्या से निपटने के लिए सरकारी बजट के अलावा फाइनेंस के विविध, भरोसेमंद और लगातार स्रोतों के साथ-साथ मज़बूत पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप की ज़रूरत है।
मंत्री ने भारत के मिले-जुले ग्रीन-फाइनेंस ढांचे पर प्रकाश डाला, जो जलवायु परिवर्तन के अनुकूल ढलने, टिकाऊ भूमि उपयोग, वानिकी और कृषि, वनीकरण और जैव विविधता संरक्षण के लिए फाइनेंसिंग को संभव बनाता है। उन्होंने भूमि बहाली, सूखे से निपटने की क्षमता, टिकाऊ वानिकी और अन्य पर्यावरणीय और जलवायु प्राथमिकताओं के लिए पूंजी जुटाने के एक ज़रिया के तौर पर सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड का भी ज़िक्र किया।
यादव ने भारत के ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम पर प्रकाश डाला, जो सरकारी और निजी संस्थाओं को खराब हो चुकी वन भूमि की बहाली के लिए फाइनेंस करने में मदद करता है। बहाली के पांच साल बाद और कम से कम 40 प्रतिशत कैनोपी डेंसिटी (पेड़ों के फैलाव का घनत्व) हासिल करने पर क्रेडिट जारी किए जाते हैं, और इनका इस्तेमाल एक बार क्षतिपूरक वनीकरण, कानूनी तौर पर ज़रूरी वृक्षारोपण या CSR दायित्वों के लिए किया जा सकता है। उन्होंने भारत की क्षतिपूरक संरक्षण व्यवस्था पर भी प्रकाश डाला, जो वन डायवर्जन (वनों के उपयोग में बदलाव) के लिए मिले भुगतान को क्षतिपूरक वनीकरण और इकोसिस्टम की बहाली की ओर ले जाती है, जबकि कॉर्पोरेट फंडिंग को पर्यावरणीय नियामक प्रक्रियाओं के साथ जोड़ा जाता है।
अलग-अलग प्रयासों को एक साथ लाने (कन्वर्जेंस) के महत्व को रेखांकित करते हुए मंत्री ने कहा कि ग्रीन क्रेडिट प्रोग्राम और क्षतिपूरक वनीकरण फंड जैसे तरीकों के ज़रिए सरकारी और निजी फाइनेंस को एक ही इलाके में और नागरिकों की भागीदारी के साथ एक साथ लाना, 'पूरी सरकार' और 'पूरे समाज' के दृष्टिकोण को दर्शाता है। श्री यादव ने इस बात पर ज़ोर दिया कि "फाइनेंस लगातार, वेरिफ़िएबल (सत्यापन योग्य) और स्थानीय समुदायों से जुड़ा होना चाहिए।" उन्होंने कहा कि भारत का अनुभव दिखाता है कि प्रतिबद्ध घरेलू संसाधन क्या हासिल कर सकते हैं, लेकिन इस बात पर ज़ोर दिया कि यह बहाली और सूखे से निपटने की क्षमता के लिए अतिरिक्त, पर्याप्त और भरोसेमंद अंतरराष्ट्रीय फाइनेंस की जगह नहीं ले सकता।
अपने भाषण का समापन करते हुए मंत्री ने अपने अनुभव, सुरक्षा उपायों, संस्थागत व्यवस्थाओं, सीखे गए सबक और उन क्षेत्रों को साझा करने के लिए भारत की प्रतिबद्धता को दोहराया जिनमें सुधार की ज़रूरत है। उन्होंने कहा, “आखिरकार, इनोवेटिव फाइनेंस को उसके डिज़ाइन या जुटाए गए संसाधनों से नहीं, बल्कि इस बात से आंका जाना चाहिए कि क्या यह उन ज़मीनों, इकोसिस्टम और समुदायों तक पहुँचता है जिन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है और क्या यह लंबे समय तक चलने वाली बहाली और मज़बूती लाता है।”
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