प्रश्न तो उठता है
अनिल विज अंबाला छावनी 26 जून 2025
यदि मसला केवल ईरान के परमाणु संस्थानों को ध्वस्त करना ही था और वह भी अमेरिका को ही करना पड़ा तो ईरान इजरायल की लड़ाई करवाने की क्या जरूरत थी । अमरीका सीधा ही हमला कर देता । इस युद्ध में ईरान और इजरायल का भरी जान माल से नुकसान हुआ है जो अगर यह आपस में न लड़ते तो बचाया जा सकता था ।
इजरायल पर ईरान के मिसाइल हमलों के बाद, 22 जून को अमेरिका इस लड़ाई में कूद गया। अमेरिका ने ईरान के परमाणु ठिकानों पर बंकर बस्टर बमों से हमले किए, जिससे ईरान को भारी नुकसान हुआ।
ईरान का परमाणु कार्यक्रम दशकों पुराना है और इसका उद्देश्य परमाणु ऊर्जा का उत्पादन करना बताया जाता है। हालांकि, अमेरिका और इजरायल सहित कई पश्चिमी देश यह आरोप लगाते रहे हैं कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में काम कर रहा है।
ईरान के पास कई परमाणु सुविधाएं हैं, जिनमें से कुछ सबसे महत्वपूर्ण हैं:
* नतान्ज़ (Natanz): यह ईरान का सबसे बड़ा यूरेनियम संवर्धन संयंत्र है। यह भूमिगत है और सेंट्रीफ्यूज (centrifuges) का उपयोग करके यूरेनियम को समृद्ध करता है। इसे अक्सर इजरायल और अमेरिका द्वारा निशाना बनाया जाता रहा है।
* फोर्डो (Fordo): यह एक अत्यधिक सुरक्षित भूमिगत सुविधा है, जो कोम शहर के पास एक पहाड़ के अंदर 80 मीटर की गहराई में स्थित है। यह नतान्ज़ के बाद ईरान का दूसरा पायलट संवर्धन संयंत्र है और इसे नष्ट करना बेहद मुश्किल माना जाता है।
* इस्फाहान (Isfahan): यहां एक यूरेनियम रूपांतरण सुविधा (Uranium Conversion Facility) और एक ईंधन प्लेट निर्माण संयंत्र (Fuel Plate Fabrication Plant) स्थित हैं।
ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह से शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, जैसे बिजली उत्पादन और चिकित्सा अनुसंधान। ईरान परमाणु अप्रसार संधि (NPT) का हस्ताक्षरकर्ता है और अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के निरीक्षण में काम करने का दावा करता है।
ईरान और इजरायल के बीच हालिया संघर्ष ने दोनों देशों को भारी नुकसान पहुंचाया है, जिसमें जानमाल का नुकसान और आर्थिक क्षति दोनों शामिल हैं। यह युद्ध 12 दिनों तक चला।
ईरान में लगभग 610 से 800 लोग मारे गए, जिनमें 263 नागरिक थे। कुछ रिपोर्ट्स में यह संख्या 950 तक बताई गई है, जिनमें 380 नागरिक और 253 सुरक्षा बल के जवान शामिल थे।
लगभग 1300 से 4746 लोग घायल हुए।
कई प्रमुख सैन्य कमांडर, परमाणु वैज्ञानिक और वरिष्ठ रिवोल्यूशनरी गार्ड अधिकारी मारे गए।
तेहरान से 1 लाख से अधिक लोगों को भागना पड़ा।
इजरायल में लगभग 24 से 30 लोग मारे गए, जिनमें ज्यादातर आम नागरिक थे।
200 से अधिक लोग घायल हुए, जिनमें ज्यादातर वे लोग थे जो हमले के दौरान बम शेल्टर में नहीं थे।
आर्थिक रूप से, ईरान को 150-200 बिलियन डॉलर का अनुमानित नुकसान हुआ।
तेल और गैस उद्योग को भारी नुकसान हुआ, जो ईरान की अर्थव्यवस्था का 60% हिस्सा है। 12 दिनों के हमलों से 3 बड़ी तेल रिफाइनरी और पाइपलाइन क्षतिग्रस्त हुईं, जिससे उत्पादन में लगभग 35% गिरावट और निर्यात में $10–12 अरब डॉलर का संभावित नुकसान हुआ।
युद्ध से पहले ईरान की जीडीपी ग्रोथ 3.5% थी, जो युद्ध के बाद घटकर सिर्फ 0.3% रह गई है।
इजरायल को आर्थिक रूप से लगभग 12 बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ।
तेज अवीव, हाइफा और बीर शेवा जैसे शहरों में नागरिक और सैन्य बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा।
लगभग 3,000 से अधिक इमारतें बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुईं। 38,700 से अधिक मुआवजे के दावे दर्ज हुए, जिनमें से 30,809 दावे केवल भवन क्षति के लिए थे।
3713 वाहन और 485 अन्य संपत्तियां भी क्षतिग्रस्त हुईं।
तेल अवीव और अश्केलोन सबसे ज़्यादा प्रभावित शहर थे।
इजरायल संघर्ष का भारत के चावल निर्यात पर भी असर पड़ा है। लगभग 14,000 टन चावल रास्ते में फंसा हुआ है और भुगतान भी रुका पड़ा है। ड्राई-फ्रूट की कीमतों पर भी असर पड़ा है क्योंकि इनकी सप्लाई ईरान और अफगानिस्तान से बाधित हुई है।
वैश्विक आर्थिक प्रभाव: कच्चे तेल की कीमतों में 11% से अधिक की बढ़ोतरी हुई। युद्ध जारी रहने पर रोजमर्रा के सामान और औद्योगिक उत्पाद महंगे हो सकते हैं।
कुल मिलाकर, इस संघर्ष से दोनों देशों को जानमाल, बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था के संदर्भ में भारी नुकसान हुआ है, जिससे क्षेत्रीय अस्थिरता भी बढ़ी है।
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