अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस

आरएस अनेजा, 02 अक्टूबर नई दिल्ली - 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के रूप में और संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में वैश्विक स्तर पर मनाया जाता है- यह एक दोहरी श्रद्धांजलि है, जो महात्मा के प्रति राष्ट्रीय गौरव और वैश्विक सम्मान दोनों को दर्शाती है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने जून 2007 में एक प्रस्ताव पारित किया, जिसमें अहिंसा को एक सार्वभौमिक सिद्धांत के रूप में मान्यता दी गई तथा शांति एवं सहिष्णुता की वैश्विक संस्कृति को बढ़ावा दिया गया।

गांधी जयंती और अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस की भावना को वैश्विक स्तर पर जीवंत रखा जाता है और बेल्जियम, अमेरिका, स्पेन, सर्बिया, स्विट्जरलैंड, थाईलैंड, कजाकिस्तान तथा नीदरलैंड जैसे देशों में स्मरणोत्सव आयोजित किए जाते हैं।

भूमिका

2 अक्टूबर को, पूरी दुनिया महात्मा गांधी के जन्मदिवस का सम्मान करती है। भारत में इस दिन को जहां गांधी जयंती के रूप में मनाया जाता है, वहीं 2007 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा पारित एक प्रस्ताव के बाद दुनिया भर में इसे अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में आयोजित किया जाता है। संयुक्त राष्ट्र में इस प्रस्ताव को 140 से अधिक देशों ने समर्थन दिया था। इस दोहरे आयोजन की वजह से इस दिन का एक अनूठा महत्व है और इसकी जड़ें भारत की राष्ट्रीय स्मृति में निहित हैं तथा इसे मानवता के एक सार्वभौमिक संदेश के रूप में साझा किया जाता है।

संयुक्त राष्ट्र में, यह दिवस महासचिव के वक्तव्यों और गांधीजी के दर्शन को आज की वास्तविकताओं से जोड़ने वाले कार्यक्रमों के साथ मनाया जाता है। हाल के वर्षों में, इन संदेशों ने दुनिया भर में चल रहे संघर्षों की ओर इशारा किया है और दुनिया के देशों को यह याद दिलाया है कि सत्य और अहिंसा में गांधीजी का अटूट विश्वास “किसी भी हथियार से कहीं अधिक शक्तिशाली है।”

भारत में, यह स्मरणोत्सव राजघाट पर श्रद्धांजलि अर्पित करने, सांस्कृतिक एवं शैक्षिक कार्यक्रमों, और गांधीजी के आदर्शों को रेखांकित करने वाले जन अभियानों के रूप में मनाया जाता है। पिछले कई वर्षों से, ये स्मरणोत्सव औपचारिकता से परे जाकर राष्ट्रीय मिशनों - स्वच्छता को बढ़ावा देने वाले स्वच्छ भारत अभियान से लेकर आत्मनिर्भरता के प्रतीक खादी एवं ग्रामीण उद्योगों के पुनरुद्धार तक को प्रेरित कर रहे हैं।

इस प्रकार, अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस एक राष्ट्रीय श्रद्धांजलि और वैश्विक कार्रवाई का आह्वान, दोनों है। यह हमें याद दिलाता है कि गांधीजी के संदेश केवल अतीत तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि ये एक ऐसी दुनिया का मार्ग प्रशस्त करते हैं जहां संघर्ष पर शांति, विभाजन पर संवाद और भय पर करुणा की जीत होती है।

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