हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: निजी भूमि पर खैर के पेड़ काटने से रोकने वाले वन विभाग के आदेश को किया रद्द
हिमाचल प्रदेश, 21 मार्च (अन्नू): हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने ऊना जिले के मंडल वन अधिकारी (DFO) के उस आदेश को खारिज कर दिया है, जिसमें निजी मालिकाना हक वाली भूमि पर सूखे और गिरे हुए खैर के पेड़ों को काटने की अनुमति देने से मना कर दिया गया था। न्यायाधीश ज्योत्स्ना रिवाल दुआ की एकल पीठ ने कुलवंत सिंह और अन्य याचिकाकर्ताओं की दलीलें सुनने के बाद यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि भूमि का मालिकाना हक और उस पर कब्जा पूरी तरह स्पष्ट है, तो वन विभाग केवल तकनीकी अड़चनों का हवाला देकर पेड़ काटने की कानूनी अनुमति को नहीं रोक सकता।
मामले के अनुसार, याचिकाकर्ताओं ने अपनी निजी जमीन पर मौजूद सूखे खैर के पेड़ों के सीमांकन और कटान के लिए विभाग के पास आवेदन किया था। हालांकि, डीएफओ ऊना ने 17 दिसंबर 2024 को इस आवेदन को यह कहते हुए ठुकरा दिया था कि यह भूमि कभी राज्य सरकार के अधीन थी, इसलिए नियमों के मुताबिक यहाँ कटान की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत ने जांच में पाया कि भले ही 1974 के अधिनियम के तहत यह जमीन सरकार के पास चली गई थी, लेकिन साल 2001 में हुए संशोधनों के बाद इसे वापस मालिकों के नाम कर दिया गया था। कोर्ट ने माना कि जब सरकार स्वयं जमीन वापस कर चुकी है और मालिक 1950 से पहले से उस पर काबिज हैं, तो विभाग का इनकार करना कानून सम्मत नहीं है।
अदालत ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर कड़ा रुख अपनाते हुए निर्देश दिया है कि विभाग दो सप्ताह के भीतर संबंधित भूमि का दोबारा सीमांकन करे। इसके साथ ही, विभाग को उन सूखे और गिरे हुए पेड़ों की पहचान करने को कहा गया है जिन्हें काटा जाना है। हाईकोर्ट ने साफ किया कि पहचान की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अगले दो सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ताओं को पेड़ काटने की औपचारिक अनुमति प्रदान कर दी जाए। इस फैसले से उन भू-स्वामियों को बड़ी राहत मिली है जो लंबे समय से वन विभाग की तकनीकी आपत्तियों के कारण अपनी ही जमीन पर सूखे पेड़ों का निस्तारण नहीं कर पा रहे थे।
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