कचरा प्रबंधन में लापरवाही पर हिमाचल हाईकोर्ट सख्त, केंद्र और राज्य से मांगी रिपोर्ट
हिमाचल/शिमला, 22 मार्च (अन्नू): हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य में ठोस कचरा प्रबंधन नियमों के उल्लंघन और कूड़े के वैज्ञानिक निपटान में बरती जा रही कोताही पर कड़ा संज्ञान लिया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार, राज्य के शहरी विकास विभाग और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सहित संबंधित जिला प्रशासनों से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि कचरा प्रबंधन में किसी भी प्रकार की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी और नियमों की अनदेखी करने वाले डिफाल्टरों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने 15वें वित्त आयोग के तहत आवंटित 111 करोड़ रुपये के फंड के उपयोग को लेकर केंद्र सरकार से सवाल किया है। आंकड़ों के अनुसार, प्रदेश में कचरा शुल्क के रूप में अपेक्षित 37.18 करोड़ रुपये के मुकाबले केवल 27.71 करोड़ रुपये ही एकत्र हो पाए हैं। इस लगभग 10 करोड़ रुपये के घाटे को देखते हुए कोर्ट ने बकाया राशि वसूलने और लापरवाही बरतने वाली संस्थाओं पर शिकंजा कसने के निर्देश दिए हैं। विशेष रूप से बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ (BBN) क्षेत्र के केंडुवाल साइट पर कचरे के अंबार पर चिंता व्यक्त करते हुए कोर्ट ने कहा कि प्लांट की क्षमता से तीन गुना अधिक कचरा वहां पहुंच रहा है, जिसके लिए सीसीटीवी निगरानी और उचित फेंसिंग अनिवार्य है।
अदालत ने पर्यावरण प्रदूषण से जुड़े एक अन्य गंभीर मामले में नाहन के सैनवाला में नदी किनारे शराब की बोतलें और लेबल फेंकने वाली कंपनियों पर 'प्रदूषक भुगतान करे' (Polluter Pays Principle) के सिद्धांत के तहत भारी जुर्माना लगाने का आदेश दिया है। इस मामले में हिमाचल के कालाअंब और हरियाणा के कुरुक्षेत्र की दो कंपनियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई है। खंडपीठ ने प्रदेश सरकार को सुझाव दिया कि कचरा प्रबंधन के लिए चंडीगढ़ के डड्डूमाजरा मॉडल जैसे विशेषज्ञों की सहायता ली जाए और 'हिमाचल प्रदेश डिपॉजिट रिफंड स्कीम 2025' को सख्ती से लागू किया जाए। मामले की अगली सुनवाई अब 14 मई को होगी।
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