स्वतंत्रता संग्राम तथा बैल और बंदर

अनिल विज अंबाला छावनी 17 जून 2025:

एक गांव में एक किसान रहता था।

उसके पास दो बैल और दो बंदर थे।

एक बार उसे किसी काम से गांव से बाहर जाना था किंतु उसकी समस्या यह थी कि खेत जोतने का भी समय हो गया था,

और काम पूरा करने के लिए गांव से बाहर भी जाना जरूरी था।

तब किसान ने उस समस्या का समाधान निकाला, उसने अपने बैलों और बंदरों 

को बुलाकर कहा कि .

मैं कुछ दिनों के लिए गांव से बाहर जा रहा हूं,

मेरे लौटने तक तुम लोग सारे खेत जोतकर रखना ताकि लौटने पर खेतों में बीज बो सकूं। बैलों और बंदरों ने स्वीकृति में सिर हिलाया दिया ।

किसान चला गया और बैलों ने किसान के कहे अनुसार खेत जोतना शुरू कर दिया, परंतु बंदर उछल कूद करते हुए सारा- सारा दिन आवारागर्दी करते रहते।

बैलों ने किसान के लौटने से पहले पूरा खेत जोत दिया।

जब बंदरों ने देखा कि खेतों की जुताई हो गई है और मालिक के लौटने का समय हो गया है

तब बंदरों ने बैलों से कहा कि तुम दोनों इतने दिनों से खेत जोत रहे हो और काफी थक गए हो इसलिए घर जाकर आराम करो और हम लोग खेतों की रखवाली करेंगे।

बंदरों की बात मानकर दोनों बैल घर चले गए और खा पीकर आराम करने लगे।

इधर बंदरों ने सारे खेतों में दौड़-भाग करके अपने पैरों के निशान बना दिए, और खेत की मेंड़ पर बैठकर किसान का इंतजार करने लगे।

थोड़ी देर में किसान वापस गांव आया और सीधा खेतों पर पहुंचा तो देखा दोनों बंदर मेंड़ पर बैठे हैं और खेतों की जुताई हो गई है, परंतु बैल कहीं नजर नहीं आ रहे थे।

किसान ने बंदरों से पूछा कि बैल कहां हैं ?

बंदरों ने कहा- मालिक आप जबसे गए थे तभी से हम लोग खेत जोत रहे हैं और अभी काम पूरा करके मेंड़ पर बैठकर आपका इंतजार कर रहे हैं,* *जबकि बैल घर से बाहर निकलकर खेतों की ओर झांकने भी नहीं आए, वह घर पर ही आराम से सो रहे हैं।

मालिक ने खेतों में जाकर देखा तो उसे हर तरफ बंदरों के पैरों के निशान मिले, वह बंदरों के उपर बहुत प्रसन्न हुआ और बंदरों के साथ घर लौटा तो देखा कि बैल घर के बाहर बैठे हुए आराम कर रहे थे।

किसान बैलों के उपर बहुत क्रोधित हुआ और बैलों को रस्सी से बांध कर उनकी पिटाई कर दिया और बंदरों को खाने के लिए दूध रोटी और फलों के टुकड़े दिए और बैलों को खाने के लिए सुखा हुआ भूसा दिया।

किसी ने ठीक ही कहा है कि

यह जो

नेहरू युनिवर्सिटी इंदिरा एयरपोर्ट और ऐसे अनेकों जगह नेहरू और गांधी का नाम देखते हो ये कुछ वैसे ही बंदरों के पैरों के निशान हैं और वे आजादी के बाद से ही दूध मलाई खा रहे हैं।

जबकि रानी लक्ष्मी बाई, तात्या टोपे,लाला लाजपत राय , वीर सावरकर, महारानी अवंतीबाई लोधी सुभाष चन्द्र बोस, रामप्रसाद बिस्मिल, भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, खुदीराम बोस.....!

जैसे हजारों असली सेनानियों

के परिवार को रुखी-सूखी घास ही मिली है ।

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