₹645 करोड़ का IDFC बैंक घोटाला: ED ने हरियाणा विकास एवं पंचायत विभाग के पूर्व अधीक्षक नरेश कुमार को किया गिरफ्तार

हरियाणा, 12 जून (अन्‍नू): ईडी के चंडीगढ़ जोनल ऑफिस ने IDFC फर्स्ट बैंक धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गहराई से जांच करते हुए हरियाणा सरकार के एक सीनियर अधिकारी को सलाखों के पीछे भेज दिया है। गिरफ्तार किए गए आरोपी की पहचान नरेश कुमार के रूप में हुई है, जो हरियाणा के विकास एवं पंचायत निदेशक (Director, Development and Panchayat, Haryana) के कार्यालय में तत्कालीन अधीक्षक (Superintendent) के पद पर तैनात था।

प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा जारी की गई आधिकारिक प्रेस रिलीज के अनुसार, आरोपी नरेश कुमार को धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 की धारा 19 के तहत 10 जून 2026 को गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के बाद आरोपी को माननीय विशेष पीएमएलए कोर्ट के समक्ष पेश किया गया, जहाँ से अदालत ने उसे 14 जून 2026 तक 4 दिनों की ईडी कस्टडी (ED Custody) में भेज दिया है।

सरकारी खातों से ₹645 करोड़ रुपये का महा-गबन

ईडी द्वारा जारी प्रेस रिलीज के मुताबिक, यह पूरा मामला आईडीएफसी फर्स्ट बैंक (IDFC First Bank) में रखे सरकारी खातों से करोड़ों रुपये की हेराफेरी और गबन से जुड़ा हुआ है।

  • जनता के पैसे की चोरी: अब तक की तफ्तीश में सामने आया है कि इस सिंडिकेट ने हरियाणा सरकार, चंडीगढ़ यूटी (UT) प्रशासन तथा चंडीगढ़ और पंचकूला स्थित दो निजी स्कूलों के बैंक खातों से कुल ₹645 करोड़ रुपये के सार्वजनिक फंड (Public Funds) का अवैध रूप से गबन किया था।

  • मुख्य साजिशकर्ता: इस महाघोटाले के मुख्य आरोपियों में विक्रम वाधवा, रिभव ऋषि और अभय कुमार शामिल हैं, जिन्होंने बैंक के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों और सरकारी कर्मचारियों के साथ मिलकर इस पूरी साजिश को अंजाम दिया।

अधीक्षक नरेश कुमार की भूमिका: 'शेल कंपनी' से खातों में ट्रांसफर हुए ₹1.20 करोड़

ईडी की जांच में तत्कालीन अधीक्षक नरेश कुमार की भूमिका इस पूरे घोटाले में एक मुख्य बिचौलिये (Key Middleman) और सूत्रधार के रूप में सामने आई है:

  • रिश्वत और कट-मनी: नरेश कुमार ने सरकारी पैसे को ठिकाने लगाने और फाइलों को पास कराने के बदले सीधे तौर पर मोटी रकम वसूली। उसे 'M/s स्वास्तिक देश प्रोजेक्ट' (M/s Swastik Desh Project) नामक एक मुखौटा (शेल) कंपनी के जरिए सीधे तौर पर फंड डायवर्ट किए गए थे।

  • काली कमाई को खपाया: नरेश कुमार और उसके परिवार के निजी बैंक खातों में सीधे तौर पर ₹1.20 करोड़ रुपये की 'प्रोसीड्स ऑफ क्राइम' (अपराध की कमाई) ट्रांसफर की गई थी।

  • कैश की डिलीवरी: बैंक खातों के अलावा, गबन किए गए फंड से जेनरेट की गई करोड़ों रुपये की भारी-भरकम नकदी (कैश) भी सीधे नरेश कुमार को व्यक्तिगत रूप से डिलीवर की गई थी, जिसे छुपाने और खपाने में उसने सक्रिय भूमिका निभाई।

हवाला और ज्वैलर्स का नेक्सस: ऐसे बदला गया पैसों का रूप

ईडी की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, इस ₹645 करोड़ रुपये की विशालकाय राशि को लेयर (पारगमन) करने के लिए कई मध्यस्थ शेल संस्थाओं जैसे M/s कैपको फिनटेक सर्विसेज, M/s स्वास्तिक देश प्रोजेक्ट्स, आर.एस. ट्रेडर्स, और M/s एसआरआर प्लानिंग गुरुज प्राइवेट लिमिटेड का इस्तेमाल किया गया था।

इन फर्जी कंपनियों के बैंक खातों से सैकड़ों करोड़ रुपये की राशि विभिन्न बड़े ज्वैलर्स (सुनारों) के खातों में ट्रांसफर की गई। इन ज्वैलर्स ने इस बैंकिंग ट्रांजैक्शन के बदले आरोपियों को भारी मात्रा में कैश (नकदी) उपलब्ध कराई। बाद में मुख्य आरोपी रिभव ऋषि और उसके साथियों ने इसी कैश को नरेश कुमार सहित अन्य भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों और लाभार्थियों में बांट दिया।

बाकी मुख्य आरोपी पहले ही जेल में, जांच जारी

ईडी ने बताया कि इस मामले में शामिल अन्य मुख्य आरोपियों—रिभव ऋषि, अभय कुमार और विक्रम वाधवा को एजेंसी द्वारा पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है और रिमांड अवधि समाप्त होने के बाद वर्तमान में वे सभी न्यायिक हिरासत (Judicial Custody) के तहत जेल में बंद हैं।

ईडी की चंडीगढ़ टीम अब रिमांड के दौरान पूर्व अधीक्षक नरेश कुमार से आमने-सामने बिठाकर पूछताछ कर रही है। जांच एजेंसी का मुख्य फोकस इस पूरे 'मनी ट्रेल' (पैसों के लेनदेन) के अंतिम छोर तक पहुंचना, इस घोटाले से लाभ उठाने वाले अन्य सफेदपोशों और अधिकारियों की पहचान करना तथा इस काली कमाई से देश-विदेश में बनाई गई संपत्तियों को अटैच करना है।

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