घरों में रखी पांडुलिपियों की सुरक्षा आवश्यक है: मुख्यमंत्री मध्यप्रदेश

एन.एस.बाछल, 14 जून, भोपाल।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि प्राचीन पांडुलिपियाँ अनेक घरों के साथ-साथ मठों और मंदिरों में भी संरक्षित हैं। हमारी सांस्कृतिक स्मृतियाँ, ज्ञान, परंपराएँ, विज्ञान और दर्शन आज भी पांडुलिपियों के रूप में विद्यमान हैं। इन्हें भावी पीढ़ियों तक पहुँचाना हमारा कर्तव्य है। इस अनमोल विरासत की रक्षा, संरक्षण और दस्तावेजीकरण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर ज्ञान भारतम मिशन की पहल शुरू की गई है। इसके अंतर्गत 1950 से पूर्व की पांडुलिपियों को डिजिटल रूप से संरक्षित किया जा रहा है। मिशन के तहत मंदिरों, मठों, आश्रमों, पुस्तकालयों, शैक्षणिक एवं अनुसंधान संस्थानों के साथ-साथ व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और घरों में मौजूद ताड़ के पत्तों, ताम्रपत्रों, पट्टिकाओं, भोजपत्रों, पोती आदि पांडुलिपियों का संरक्षण किया जाना है। यह क्षेत्र ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से समृद्ध है। यहाँ के धार्मिक स्थलों के साथ-साथ अनेक परिवारों और व्यावसायिक संस्थानों के पास भी पर्याप्त मात्रा में पांडुलिपियाँ हैं। भारत की ज्ञान परंपरा की रक्षा के लिए इस राष्ट्रीय अभियान में क्षेत्र के लोगों को सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रोत्साहित करना महत्वपूर्ण है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कलेक्टर के वीडियो कॉन्फ्रेंस में ज्ञान भारतम मिशन के संबंध में ये निर्देश दिए। मुख्यमंत्री आवास स्थित समत्व भवन में आयोजित बैठक में मुख्य सचिव अनुराग जैन, अतिरिक्त मुख्य सचिव नीरज मंडलोई और अतिरिक्त मुख्य सचिव संस्कृति शिव शेखर शुक्ला उपस्थित थे।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव की अध्यक्षता में हुई बैठक में बताया गया कि इस क्षेत्र के जिलों में अनुमानित 10 लाख 24 हजार 571 पांडुलिपियां उपलब्ध हैं। पांडुलिपियों के संरक्षण के लिए जिला स्तर पर कलेक्टर की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया है। यह समिति सर्वेक्षण कर रही है और ज्ञान भारतम मोबाइल ऐप के माध्यम से पांडुलिपियों को अपलोड कर रही है। इस कार्य के लिए भारत सरकार और क्षेत्र के पुरातत्व विभाग द्वारा प्रत्येक जिले के लिए एक प्रतिनिधि नियुक्त किया गया है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने पांडुलिपि संरक्षण अभियान के लिए पांडुलिपि धारकों से संवाद स्थापित करने और उन्हें अभियान से जोड़ने के लिए जिला स्तर पर गतिविधियां संचालित करने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि इन गतिविधियों में शिक्षण संस्थानों और शोधकर्ताओं की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

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