मोहाली-चंडीगढ़ बॉर्डर पर किसानों के पक्के मोर्चे का दूसरा दिन, ट्रैफिक डायवर्ट
चंडीगढ़ , 02 सितंबर (अभिकान्त) : मोहाली-चंडीगढ़ बॉर्डर पर किसानों के आंदोलन का आज दूसरा दिन है। पंजाब के 32 किसान संगठनों की ओर से सात दिन के पक्के मोर्चे के ऐलान के बाद बॉर्डर पर किसानों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। बड़ी संख्या में किसान ट्रैक्टर-ट्रॉलियों के साथ मोर्चे पर पहुंच रहे हैं, जिसके चलते चंडीगढ़ पुलिस ने भी सुरक्षा व्यवस्था और अधिक कड़ी कर दी है। आईसर इंस्टीट्यूट से जगतपुरा की तरफ आने वाले मार्ग पर पुलिस ने एक तरफ का रास्ता बंद कर दिया है और सड़क के एक हिस्से से ही दोनों तरफ का ट्रैफिक निकाला जा रहा है, जिससे वाहन चालकों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
किसान नेता हरिंदर सिंह लखोवाल ने दावा किया है कि मोर्चे में 20 हजार से ज्यादा किसान पहुंच चुके हैं। इससे पहले फेज-11 स्थित कैंडी होटल में किसान नेताओं की एक अहम बैठक हुई, जिसमें आंदोलन की आगे की रणनीति पर विस्तार से चर्चा की गई। फेज-11 से जगतपुरा तक सड़क के एक हिस्से पर भारी संख्या में ट्रैक्टर-ट्रॉलियां खड़ी होने के कारण मोहाली से चंडीगढ़ जाने वाले मार्ग पर यातायात काफी प्रभावित हुआ है। सेक्टर-48 के पास ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की संख्या बढ़ने से पार्किंग की जगह कम पड़ गई है, जिसे देखते हुए पुलिस ने उस तरफ वाहनों की आवाजाही रोकने के लिए बैरियर लगाए हैं।
इस सात दिवसीय पक्के मोर्चे के दौरान किसान संगठनों के कई शीर्ष नेता मंच से किसानों को संबोधित कर रहे हैं। इनमें बीकेयू-राजेवाल के अध्यक्ष बलबीर सिंह राजेवाल, बीकेयू-टोंग के अध्यक्ष हरविंदर सिंह रंधावा, बीकेयू-डकोंदा के अध्यक्ष बूटा सिंह बुर्जगिल, बीकेयू-कादियां के अध्यक्ष हरमीत सिंह कादियां, बीकेयू-मशहूर के अध्यक्ष रेशम सिंह और एसकेएम पंजाब के अध्यक्ष परमजीत सिंह समेत कई प्रमुख नेता शामिल हैं। इसके अलावा राजिंदर सिंह घुमान, कुलवंत सिंह राजेवाल और हरिंदर सिंह लखोवाल भी मोर्चे में लगातार मौजूद रहकर नेतृत्व कर रहे हैं।
किसान नेताओं ने स्पष्ट कहा कि उनकी लंबित मांगों को लेकर अब सरकार को जवाब देना होगा और मुद्दों पर एक-एक मीटर का हिसाब देना होगा। इस आंदोलन के दौरान भारत-अमेरिका कृषि समझौते का विरोध, पानी से जुड़े मुद्दों का स्थायी समाधान, नए कानूनों को लेकर आपत्तियां और फसलों पर मुआवजे व एमएसपी से जुड़ी प्रमुख मांगें मुख्य रूप से उठाई जा रही हैं। किसान संगठनों का कहना है कि सात दिन के इस पक्के मोर्चे के जरिए सरकार पर अपनी मांगों को पूरा करने का कड़ा दबाव बनाया जाएगा।
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