दिल्ली हाई कोर्ट: बिना FIR या ठोस कारण बैंक खाता फ्रीज करना 'जीवन के अधिकार' का उल्लंघन

अभिकान्त, 14 मई नई दिल्ली : दिल्ली हाई कोर्ट ने साइबर अपराधों की जांच के दौरान बैंक खातों को फ्रीज करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा है कि बिना किसी उचित कारण, प्राथमिकी (FIR) या न्यायिक आदेश के किसी व्यक्ति का बैंक खाता फ्रीज करना संविधान द्वारा दिए गए 'जीवन के अधिकार' (Article 21) में बाधा डालने के समान है। न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव की पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि बैंक खाता किसी भी व्यक्ति के आर्थिक अस्तित्व का मूल आधार होता है और इसे मनमाने ढंग से बंद नहीं किया जा सकता।

मामले की सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि अक्सर देखा गया है कि साइबर सेल या जांच एजेंसियां केवल संदेह के आधार पर बैंक खातों को फ्रीज कर देती हैं, जिससे संबंधित व्यक्ति को गंभीर वित्तीय और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। पीठ ने रेखांकित किया कि यदि खाताधारक के खिलाफ कोई ठोस आरोप, एफआईआर या न्यायालय का स्पष्ट निर्देश नहीं है, तो केवल जांच के नाम पर किसी के आर्थिक संसाधनों को रोकना कानूनन सही नहीं है। बैंक खातों का इस्तेमाल व्यक्ति अपनी बुनियादी जरूरतों और दैनिक जीवन के संचालन के लिए करता है, ऐसे में बिना प्रक्रिया का पालन किए की गई कार्रवाई उसके जीवन जीने के अधिकार को प्रभावित करती है।

अदालत ने जांच एजेंसियों को नसीहत देते हुए कहा कि साइबर अपराधों की रोकथाम जरूरी है, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि आम नागरिकों के अधिकारों का हनन किया जाए। कोर्ट ने आदेश दिया कि बैंक खातों को फ्रीज करने से पहले जांच एजेंसियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इसके पीछे पर्याप्त साक्ष्य और उचित कानूनी आधार मौजूद हैं। इस फैसले को उन हजारों बैंक खाताधारकों के लिए एक बड़ी राहत के रूप में देखा जा रहा है, जिनके खाते अक्सर बिना किसी पूर्व सूचना या स्पष्ट कारण के फ्रीज कर दिए जाते हैं, जिससे उन्हें अपनी ही जमा पूंजी के लिए अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं।

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