29/07/26

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के कार्यकाल के चार साल पूरे होने पर राष्ट्रपति भवन में पांच स्मृति पुस्तकें जारी की गईं

आरएस अनेजा, 29 जुलाई नई दिल्ली - भारत के उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने आज राष्ट्रपति भवन में, भारत की माननीय राष्ट्रपति द्रौपदी  मुर्मु के कार्यकाल के चार साल पूरे होने के उपलक्ष्य में पांच स्मृति पुस्तकों के पहले सेट का विमोचन किया और राष्ट्रपति को भेंट किया।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के कार्यकाल के चार साल पूरे होने पर, आज राष्ट्रपति भवन में चार पुस्तकें, राष्ट्रपति भवन: राष्ट्र का भवन, सेवा और संवेदना, समावेशी सहभागिता और भारतीयता का उत्सव जारी की गईं। ये किताबें सूचना और प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित की गई हैं। इन पुस्तकों के अलावा, ओडिया भाषा में एक और किताब आमा राष्ट्रपति आमा गौरव भी जारी की गई। आमा राष्ट्रपति आमा गौरव भारत की राष्ट्रपति पर लिखे लेखों का संग्रह है।

इन पुस्तकों को भारत की माननीय राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु, भारत के माननीय उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन और सूचना एवं प्रसारण तथा संसदीय कार्य मंत्रालय में राज्य मंत्री डॉ. एल. मुरुगन की गरिमामयी उपस्थिति में जारी किया गया।

इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि इन पुस्तकों के शीर्षक समावेशी लोकतंत्र में हमारे विश्वास को दर्शाते हैं। उन्होंने भरोसा जताया कि तस्वीरों पर आधारित ये किताबें पाठकों को राष्ट्रपति भवन की परंपराओं, कामकाज और कई पहलुओं से परिचित कराएंगी। उन्होंने कहा कि इनकी असली अहमियत इस बात में है कि ये देशवासियों को अपनी विरासत पर गर्व करते हुए विकास की राह पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं।

राष्ट्रपति ने कहा कि जब उन्होंने 25 जुलाई, 2022 को भारत के राष्ट्रपति का पद संभाला, तो यह उनके लिए सम्मान से कहीं ज़्यादा एक ज़िम्मेदारी का काम था। उन्होंने कहा कि पिछले चार वर्षों में उन्होंने इसी ज़िम्मेदारी की भावना के साथ अपने कर्तव्यों का पालन किया है। उन्होंने कहा कि जब भी वह राष्ट्रपति भवन में या अलग-अलग राज्यों की यात्राओं के दौरान लोगों, खासकर युवाओं से मिलती हैं, तो वह उन्हें नैतिक मूल्यों से जुड़े रहने और देश तथा समाज के विकास के लिए काम करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। उन्होंने कहा कि वह महिलाओं से आत्मनिर्भर बनने और आत्मविश्वास के साथ तरक्की की राह पर आगे बढ़ने का आग्रह करती हैं। आदिवासी समुदायों के सदस्यों से बातचीत करते हुए, वह उनसे अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोने और साथ ही विकास की मुख्यधारा से जुड़ने का भी अनुरोध करती हैं। इसके साथ ही जब भी वह विदेश यात्रा पर जाती हैं, तो उन देशों में भारतीय समुदाय से मिलती हैं और उन्हें भारत की विकास यात्रा में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित करती हैं।

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