मोहाली: नशेड़ी बेटे ने ईंटों से पीटकर की थी पिता की हत्या, DNA रिपोर्ट ने पुख्ता किया गुनाह, कोर्ट ने सुनाई उम्रकैद
पंजाब/मोहाली, 28 फरवरी (अन्नू): पंजाब के मोहाली जिले में अदालत ने एक कलयुगी बेटे को अपने ही पिता की निर्मम हत्या का दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है। यह मामला खरड़ के मुंडी खरड़ इलाके का है, जहाँ फरवरी 2020 में नशे के आदी युवक रिंकू ने पैसे न देने और डांटने से नाराज होकर अपने 50 वर्षीय पिता हंस राज पर ईंटों से हमला कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया था। मोहाली कोर्ट ने न केवल रिंकू को आजीवन कारावास की सजा दी, बल्कि उस पर 20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। सजा सुनाए जाने के तुरंत बाद दोषी को जेल भेज दिया गया।
अभियोजन पक्ष और सरकारी वकील ने इस जघन्य अपराध को 'रेयरेस्ट ऑफ रेयर' की श्रेणी में रखते हुए फांसी की सजा की मांग की थी। हालांकि, माननीय अदालत ने मामले की परिस्थितियों का अवलोकन करते हुए इसे उस श्रेणी में नहीं माना और उम्रकैद को उचित सजा तय किया। गौरतलब है कि मृतक हंस राज मजदूरी कर घर चलाता था, जबकि उसका बेटा रिंकू बेरोजगार था और नशे की दलदल में फंसा हुआ था। घटना की रात नशे के लिए पैसे न मिलने पर उसने अपने पिता के सिर पर ईंटों से ताबड़तोड़ वार किए थे, जिससे उनकी मौके पर ही मौत हो गई थी।
इस केस में एक नाटकीय मोड़ तब आया जब शिकायतकर्ता और दोषी का सगा भाई सोनू अदालत में अपनी गवाही से पलट गया और अपने भाई को बेगुनाह बताने लगा। कोर्ट ने इसे पारिवारिक मोह और भाईचारे से प्रेरित बयान माना और इसे सिरे से खारिज कर दिया। मामले को सुलझाने में फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (CFSL) की रिपोर्ट सबसे महत्वपूर्ण कड़ी साबित हुई। डीएनए (DNA) टेस्ट के जरिए यह पुष्टि हुई कि रिंकू के कपड़ों पर मौजूद खून के धब्बे उसके पिता हंस राज के ही थे। साथ ही, घटनास्थल से बरामद ईंटों और हड्डी के टुकड़ों का मिलान भी मृतक के डीएनए से हो गया, जिसने रिंकू के झूठ की पोल खोल दी।
अदालत ने मेडिकल रिपोर्ट और पुलिस गवाही को आधार मानते हुए बचाव पक्ष की उन दलीलों को ठुकरा दिया, जिनमें एफआईआर में देरी और गवाहों के बयानों में मामूली अंतर का हवाला दिया गया था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में साफ हुआ कि हंस राज की मृत्यु सिर में गंभीर चोट लगने के कारण हुए हेमरेज और शॉक से हुई थी। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि समय के साथ गवाहों के बयान में आने वाली छोटी-मोटी असंगतियां स्वाभाविक हैं और वैज्ञानिक सबूतों के सामने इनका कोई महत्व नहीं है। इस फैसले के साथ ही एक वृद्ध पिता को अंततः न्याय मिला है।
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