संस्कृति मंत्रालय, तमिलनाडु में राज्यव्यापी महोत्सव और शैक्षिक पहल के माध्यम से 'कम्ब रामायण' का पुनर्जागरण और सहेजना
आरएस अनेजा, 18 मार्च नई दिल्ली
संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत दक्षिण क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र (एसजेडसीसी) तमिल साहित्य में सबसे महत्वपूर्ण कृतियों में से एक, कम्ब रामायण को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के प्रयास में, एक व्यापक पहल का शुभारंभ कर रहा है। इसका उद्देश्य 'कम्ब रामायण' के वाचन की मौखिक परंपरा और इसके व्यापक सांस्कृतिक प्रभाव को पुनर्जागृत करना है। इस समारोह का उद्घाटन तमिलनाडु सरकार के समन्वय में 18 मार्च 2025 को केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत द्वारा किया जाएगा। इसके बाद तमिलनाडु के कई मंदिरों में इसका प्रदर्शन किया जाएगा, जिनमें कुंभकोणम, चेंगलपट्टू, रामनाथपुरम, चेन्नई, तंजावुर और अन्य स्थल शामिल हैं।
इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम का उद्घाटन समारोह ऐतिहासिक श्रीरंगम मंदिर, त्रिची में होगा, जिसमें सम्पूर्ण तमिलनाडु से कम्ब रामायण मंडली (सांस्कृतिक मंडली) भाग लेंगी। ये स्थानीय सांस्कृतिक मंडलियां महाकाव्य का पारंपरिक पाठ करेंगी तथा अपनी अनूठी मंत्रोच्चार तकनीक का प्रदर्शन करेंगी।
इस पहल में प्रदर्शनों, कार्यशालाओं, संगोष्ठियों और शैक्षिक प्रतियोगिताओं की एक श्रृंखला भी शामिल होगी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भावी पीढ़ियां इस महाकाव्य से जुड़ सकें और इसकी सराहना कर सकें, जो लंबे समय से तमिल विरासत का अभिन्न अंग रहा है।
यह कार्यक्रम तीन अलग-अलग चरणों में आयोजित किया जाएगा, जिनमें से प्रत्येक कम्ब रामायण के संरक्षण और प्रसार में योगदान देगा:
चरण I: उद्घाटन समारोह (18 मार्च, 2025): इस उत्सव का शुभारंभ श्रीरंगम मंदिर में होगा, जिसमें सम्पूर्ण तमिलनाडु से कम्ब रामायण मंडली द्वारा गायन और प्रदर्शन किया जाएगा। उद्घाटन समारोह के बाद, इसके प्रदर्शन राज्य भर के प्रमुख मंदिरों जैसे- थिरुपुलम्बुथांगुडी, मदुरंतकम, थिरुनीरमलाई और वडुवुर में किये जाएंगे।
चरण II: कंबरमेडु में कम्ब रामायण महोत्सव (30 मार्च - 06 अप्रैल, 2025): थेराझुंडूर में कंबर के जन्मस्थान कंबरमेडु में एक सप्ताह तक चलने वाले भव्य समारोह का आयोजन किया जाएगा। इस समारोह में कम्ब रामायण का निरंतर पाठ, नृत्य नाटक और महाकाव्य के सांस्कृतिक और साहित्यिक महत्व पर विद्वानों की चर्चाएं होंगी। डॉ. सुधा शेषयान, भारती भास्कर और दुष्यंत श्रीधर जैसे प्रतिष्ठित विद्वान एवं कलाकार संगोष्ठियों का नेतृत्व करेंगे, जबकि कम्ब रामायण पर आधारित नृत्य प्रदर्शन गाथा को नवीन नाट्य शैलियों में जीवंत रूप प्रदान करेंगे।
चरण III: राज्यव्यापी कार्यक्रम और विद्यालयों की सहभागिता (जुलाई-अक्टूबर 2025): जुलाई से अक्टूबर 2025 तक, एसज़ेडसीसी पूरे तमिलनाडु के स्कूलों और कॉलेजों में कार्यशालाओं और प्रतियोगिताओं की एक श्रृंखला आयोजित करेगा, जिसमें छात्रों को पाठ और विद्वानों की चर्चाओं के माध्यम से कम्ब रामायण से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। इस चरण का समापन कम्बारमेडु में एक भव्य समारोह के साथ होगा, जहां सर्वश्रेष्ठ कलाकार दशहरा समारोह के दौरान अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करेंगे।
कार्यक्रम की प्रमुख विशेषताएं:
इसाई (संगीत/प्रदर्शन): कम्ब रामायण मंडली विभिन्न स्थलों पर गायन प्रस्तुत करेगी, जिसका समापन कम्बार मेडु में 9 दिवसीय महोत्सव के साथ होगा।
इयाल (साहित्य/विद्वतापूर्ण सहभागिता): प्रख्यात विद्वानों की एक संगोष्ठी में कम्ब रामायण के साहित्यिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व की जानकारी दी जाएगी।
नाटकम (रंगमंच/नृत्य नाटक): महोत्सव में महाकाव्य पर आधारित नृत्य नाटक प्रस्तुत किए जाएंगे, जिनमें रंगमंच के माध्यम से कहानी को प्रस्तुत किया जाएगा।
स्कूल और कॉलेज प्रतियोगिताएं: छात्र कविता वाचन कार्यशालाओं और प्रतियोगिताओं में भाग लेंगे और इन प्रतियोगिताओं के विजेता महोत्सव के भव्य समापन समारोह में प्रस्तुति देंगे।
तमिलनाडु के थेराझुंडूर में स्थित कंबरमेडु, कंबर का जन्मस्थली है, वह कवि जिन्होंने तमिल साहित्य में सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक कृतियों में से एक कम्ब रामायण की रचना की थी। 12वीं-13वीं शताब्दी में रचित रामायण का यह संस्करण वाल्मीकि रामायण से प्रोत्साहित एक अनूठा और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध रूपांतर है। हालांकि एक समय में तमिल सांस्कृतिक जीवन का अभिन्न अंग रही कम्ब रामायण को स्थानीय मंडली (सांस्कृतिक समूहों) के माध्यम से सुनाने की मौखिक परंपरा में काफी कमी आई है। तमिलनाडु में कई युवा पीढ़ी अब कंबर के महाकाव्य से अपरिचित हैं, और सांस्कृतिक प्रथा विलुप्त होने के कगार पर है।
स्थिति की गंभीरता को समझते हुए, दक्षिण क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र (एसजेडसीसी) का लक्ष्य एक एकीकृत उत्सव और शैक्षिक पहल के निर्माण के माध्यम से कम्ब रामायण के प्रदर्शन, शिक्षा और जुड़ाव को पुनर्जीवित करके इसे बनाए रखते हुए प्रसारित करना है। यह प्रस्ताव न केवल तमिल सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने का प्रयास करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि इसे भविष्य की पीढ़ियों तक पहुंचाया जाए।