पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: मां के पास बच्चे का रहना गैर कानूनी नहीं

चंडीगढ़, 17 मार्च (अन्‍नू): पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने बच्चों की कस्टडी को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्पष्ट किया है। अदालत ने दृढ़ता से कहा है कि यदि कोई मासूम बच्चा अपनी मां के संरक्षण में रह रहा है, तो उसे किसी भी स्थिति में गैरकानूनी या 'अवैध हिरासत' की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। जस्टिस रूपिंदरजीत चाहल की पीठ ने एक 6 महीने की बच्ची की कस्टडी पाने के लिए उसके पिता द्वारा दायर की गई याचिका को सिरे से खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानूनी रूप से मां ही बच्चे की स्वाभाविक अभिभावक (Natural Guardian) होती है और जब तक कोई सक्षम न्यायालय इसके विपरीत आदेश जारी नहीं करता, तब तक मां के पास बच्चे की मौजूदगी पूरी तरह वैध है।


सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कस्टडी मामलों में अपनाए जाने वाले कानूनी तरीकों पर भी गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि अक्सर लोग बच्चे का संरक्षण हासिल करने के लिए 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' (Habeas Corpus) याचिका का सहारा लेते हैं, जो कि उचित प्रक्रिया नहीं है। पीठ के अनुसार, यह विशेष याचिका केवल तब प्रभावी होती है जब किसी व्यक्ति को वास्तव में गलत तरीके से बंधक बनाकर रखा गया हो। बच्चे की कस्टडी तय करने के लिए एक अलग कानूनी ढांचा मौजूद है, जिसमें केवल माता-पिता के दावों को नहीं, बल्कि बच्चे के सर्वांगीण विकास, उसकी सुरक्षा, बेहतर भविष्य और प्राथमिक जरूरतों को केंद्र में रखकर निर्णय लिया जाता है।


यह मामला पंचकूला के एक व्यक्ति से जुड़ा था, जिसने अपनी पत्नी पर आरोप लगाया था कि वह बच्ची को लेकर अपने मायके चली गई है। पिता का दावा था कि मां बच्ची की उचित देखभाल नहीं कर रही और उसके टीकाकरण (Vaccination) में भी लापरवाही बरती जा रही है। हालांकि, माननीय न्यायालय ने इन दलीलों को बच्ची की कस्टडी मां से छीनकर पिता को सौंपने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना। कोर्ट ने साफ कर दिया कि केवल इन आरोपों के आधार पर मां के पास बच्ची की मौजूदगी को 'अवैध' नहीं ठहराया जा सकता।


अंत में, हाईकोर्ट ने दोहराया कि ऐसे संवेदनशील मामलों में शॉर्टकट के बजाय सही कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जाना अनिवार्य है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायिक प्रक्रिया में सर्वोपरि हित हमेशा 'बच्चे का कल्याण' (Welfare of the Child) ही रहेगा। इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पारिवारिक विवादों के बीच बच्चों के संरक्षण से जुड़े मामलों को पूरी संवेदनशीलता और निर्धारित कानूनी प्रोटोकॉल के तहत ही निपटाया जाना चाहिए।



#HighCourtVerdict #ChildCustody #MothersRights #LegalNews #PunjabHaryanaHighCourt #ChildWelfare #JudicialUpdate #LawAndJustice #DanikKhabar

Previous

हमारे बच्चों को पौष्टिक भोजन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त होना अत्यंत आवश्यक है: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु

Next

अंबाला पुलिस की बड़ी कामयाबी: 20 लाख की सोना चोरी का आरोपी मुकेश उर्फ़ लल्लू गिरफ्तार, वारदात में इस्तेमाल एक्टिवा बरामद