हरियाणा विधानसभा गठन के 9 महीने बाद भी सदन में नेता प्रतिपक्ष नहीं
एडवोकेट हेमंत कुमार, 26 जुलाई 2025 चंडीगढ़
गत 24 जुलाई को मौजूदा 15वीं हरियाणा विधानसभा के गठन को नौ महीने पूरे हो गए हालांकि आज तक सदन में नेता प्रतिपक्ष (विपक्ष का नेता) का महत्वपूर्ण पद रिक्त है. यह इसलिए भी अत्यंत आश्चर्यजनक है क्योंकि प्रदेश वि.स. के गत छ: दशकों के इतिहास में पहली बार सदन में किसी विपक्षी दल के तीन दर्जन से ऊपर विधायक हैं.
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के एडवोकेट और विधायी मामलों के जानकार हेमंत कुमार ने बताया कि चूँकि वर्तमान 15वीं हरियाणा विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल (सी.एल.पी.) के 37 सदस्यों (विधायकों ) द्वारा सदन में अपना नेता नहीं चुना गया है जिस कारण विधानसभा स्पीकर हरविन्द्र कल्याण द्वारा उस चुने जाने वाले नेता को सदन के नेता प्रतिपक्ष का दर्जा दिया जाना भी लंबित है. उन्होंने बताया कि हालांकि वर्ष 1982 में छठी हरियाणा वि.स. में भी तत्कालीन लोकदल-भाजपा गठबंधन ने 37 सीटें ( 31 लोकदल और 6 भाजपा) जबकि कांग्रेस ने 36 सीटें जीती थी जिसके बाद प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल जी.डी. तपासे ने हालांकि लोकदल-भाजपा के नेता देवी लाल की बजाये एक विवादास्पद निर्णय लेकर कांग्रेस के भजन लाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी थी जिसके फलस्वरूप लोकदल-भाजपा गठबंधन के कई विधायक पाला बदलकर कांग्रेस में शामिल होकर सरकार में मंत्री और चेयरमैन सरीखे पदों पर नियुक्त हो गए थे जिससे विपक्षी गठबंधन की मूल संख्या 37 से कम हो गई थी. वैसे भी तब देश में दल-बदल विरोधी कानून नहीं था एवं विधायक बिना रोक-टोक के दल-बदल कर एक पार्टी से दूसरी पार्टी में जाने के लिए पूर्णतया स्वतंत्र थे. उस समय हालांकि लोकदल की चन्द्रावती तत्कालीन हरियाणा वि.स. में नेता प्रतिपक्ष रही थी.
हेमंत ने बताया कि हालांकि हरियाणा में पंजाब की तर्ज पर नेता प्रतिपक्ष हेतु विशेष कानून तो नहीं बनाया गया है परन्तु हरियाणा विधान सभा (सदस्यों का वेतन, भत्ते और पेंशन ) अधिनियम, 1975 की धारा 2 (डी) में सदन के नेता प्रतिपक्ष को परिभाषित किया गया है जिसका अर्थ है सदन का वह सदस्य जिसे इस पद हेतु स्पीकर द्वारा मान्यता प्रदान की गई हो. यही नहीं उक्त 1975 कानून की धारा 4 में सदन में नेता प्रतिपक्ष के वेतन-भत्तों और अन्य सुविधाओं हेतु विशेष उल्लेख किया गया है एवं इस पद पर आसीन पदाधिकारी का दर्जा हरियाणा प्रदेश के कैबिनेट मंत्री के समकक्ष होता है. इस प्रकार से हरियाणा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद एक वैधानिक पद है. यहाँ तक कि नेता प्रतिपक्ष के वेतन -भत्तों आदि पर इनकम टैक्स (आयकर) का भुगतान भी प्रदेश के सरकारी खजाने से किया जाता है.
हेमंत ने बताया कि मार्च 2021 में हरियाणा विधानसभा की प्रक्रिया और कार्य संचालन सम्बन्धी नियमावली में नियम संख्या 2 में संशोधन कर प्रतिपक्ष के नेता को परिभाषित किया गया था जिससे अभिप्राय है सदन में ऐसे बड़े विधायक दल का नेता जिसके सदस्यों की संख्या सरकार का गठन करने वाले दल/दलों को छोड़कर सबसे अधिक हो तथा कम से कम सदन की गणपूर्ति की संख्या ( जो हरियाणा वि.स. में 10 है) के बराबर संख्या हो तथा विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) द्वारा यथा मान्यता प्राप्त हो.
अब चूँकि गत नौ महीने से वर्तमान हरियाणा विधानसभा में विपक्ष का नेता नहीं है, तो इससे नेता प्रतिपक्ष (दर्जा कैबिनेट मंत्री के समकक्ष) के वेतन-भत्तों एवं अन्य सुविधाओं आदि होने वाला व्यय (खर्चा) न होने से प्रदेश के सरकारी खजाने में कुछ बचत अवश्य हुई है. प्रदेश सरकार के एक कैबिनेट मंत्री पर प्रतिमाह होने वाला कुल व्यय करीब तीन से चार लाख रुपये के बीच पड़ता है. नेता प्रतिपक्ष को राजधानी चंडीगढ़ में कैबिनेट मंत्री के सामान एक सरकारी आवास भी मिलता है. सनद रहे कि पिछली 14वीं हरियाणा वि.स. में नेता प्रतिपक्ष रहे भूपेंद्र हुड्डा ने आज तक उन्हें सेक्टर 7 चंडीगढ़ में आबंटित सरकारी कोठी खाली नहीं की है.
इसी बीच हेमंत ने बताया कि मौजूदा 15वीं हरियाणा विधानसभा के गठन के पिछले नौ महीनों में सर्वप्रथम गत वर्ष नवम्बर,2024 में जब हरियाणा मानवधिकार आयोग के चेयरमैन और दो सदस्यों की नियुक्ति का मामला आया था, जिसके लिए कानून में प्रस्तावित चयन समिति में हालांकि मुख्यमंत्री के अलावा वि.स. में नेता प्रतिपक्ष के शामिल होने का भी प्रावधान है परन्तु चूँकि कानून में ऐसा उल्लेख भी है कि आयोग के चेयरमैन और सदस्यों की नियुक्ति केवल इस कारण से अविधिमान्य (गैर-कानूनी) नहीं होगी क्योंकि उपरोक्त चयन कमेटी में कोई रिक्ति है, इसलिए तब तो हरियाणा में नेता प्रतिपक्ष नहीं होने से कोई समस्या नहीं आई थी. हालांकि दो माह पूर्व मई महीने में राज्य सूचना आयोग में सूचना आयुक्तों के चयन हेतू समिति की बैठक में भूपेंद्र हुड्डा बतौर नेता प्रतिपक्ष नहीं सदन में सबसे बड़े विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी के प्रतिनिधि में शामिल हुए थे चूँकि ऐसा कानूनन आवश्यक था.
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