चंचल मन ही मनुष्य के बंधन और पतन का कारण, मन खत्म होने पर ही होता है आत्मा का बोध: स्वामी ज्ञान नाथ महाराज
अंबाला, 14 जुलाई (अन्नू): निराकारी जागृति मिशन के गद्दीनशीन चेयरमैन स्वामी ज्ञान नाथ महाराज ने आध्यात्मिक संदेश देते हुए कहा कि चंचल मन ही मनुष्य के बंधन और पतन का मूल कारण है। जब तक मनुष्य का मन चंचल और अनियंत्रित रहेगा, तब तक वह सांसारिक बंधनों में जकड़ा रहेगा।
मन ही मनुष्य का मित्र और शत्रु
रुहानी सत्संग में उमड़े श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए स्वामी ज्ञान नाथ महाराज ने मन और आत्मा के संबंध को गहराई से समझाया। उन्होंने कहा कि मन का जन्म वास्तव में अहंकार से होता है। जहां मनुष्य का मन (सांसारिक इच्छाएं और विचार) समाप्त होता है, ठीक उसी स्थान से आत्मा का वास्तविक बोध शुरू होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र और सबसे बड़ा शत्रु कोई और नहीं, बल्कि उसका अपना मन ही है।
मन आत्मा का बिगड़ैल पुत्र
स्वामी ज्ञान नाथ महाराज ने मन की तुलना करते हुए कहा कि मन दरअसल आत्मा का एक बिगड़ैल पुत्र है। जो इंसान अपने इस चंचल मन के पीछे-पीछे चलता है और उसकी इच्छाओं का दास बन जाता है, उसका लौकिक (सांसारिक) और पारलौकिक (आध्यात्मिक) दोनों ही जीवन बुरी तरह प्रभावित होते हैं।
मुक्ति मन को चाहिए, आत्मा को नहीं
सत्संग के दौरान उन्होंने एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक रहस्य उजागर करते हुए कहा कि मुक्ति की आवश्यकता मन को होती है, आत्मा को नहीं। आत्मा तो जन्म-मरण से परे अजर-अमर, अविनाशी और अपने मूल स्वभाव से ही सदैव स्वतंत्र व मुक्त है। इसलिए मनुष्य को अपने मन को नियंत्रण में रखकर आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानने का प्रयास करना चाहिए।
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