इस क्षेत्र का "बांग्ला पान" पड़ोसी देशों के "बांग्ला पान" के समान है : मध्यप्रदेश

एन.एस.बाछल, 30 मई, भोपाल।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में इस क्षेत्र के किसानों के कल्याण के लिए निरंतर कार्य किया जा रहा है। इसके सकारात्मक परिणाम स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं। आज मध्य प्रदेश का पान अपनी अनूठी सुगंध, कोमलता और स्वाद के कारण न केवल देश में बल्कि पड़ोसी देशों में भी तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। छतरपुर, रीवा, मंदसौर, नरसिंहपुर और टीकमगढ़ जैसे जिलों में वर्षों से पान की खेती की जा रही है, जो आज किसानों के लिए आय का एक मजबूत स्रोत बन रही है। विशेष रूप से छतरपुर का "बांग्ला पान" अपनी गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध है, जिसकी मांग पड़ोसी देशों - पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका तक फैल चुकी है।

मध्य प्रदेश सरकार ने पान की खेती को बढ़ावा देने के लिए एक विशेष कार्य योजना लागू की है, जिसके तहत 10 जिलों को कवर करते हुए 1 करोड़ 3 लाख रुपये का प्रावधान किया गया है। इस योजना में किसानों को प्रशिक्षण, आधुनिक तकनीक, उन्नत किस्मों की पौध सामग्री और क्यारियां बनाने के लिए सहायता प्रदान की जा रही है।

छतरपुर में उगाई जाने वाली बांग्ला पान की पत्तियां अपनी पतली बनावट, हल्की मिठास और लंबे समय तक ताजगी बनाए रखने की क्षमता के कारण निर्यात के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है। वहीं, रीवा जिले के महासाम क्षेत्र के दो गांवों में उत्पादित पान की पत्तियों की भी अपनी एक अलग पहचान है। यहां का पान उत्तर प्रदेश के प्रमुख शहरों - वाराणसी, प्रयागराज और लखनऊ - में बड़े पैमाने पर निर्यात किया जाता है, जहां यह बहुत लोकप्रिय है।

मध्य प्रदेश में पान की खेती मुख्य रूप से चौरसिया समुदाय द्वारा पारंपरिक रूप से की जाती है। यह समुदाय पीढ़ियों से इस व्यवसाय से जुड़ा हुआ है और अपने अनुभव और पारंपरिक ज्ञान के आधार पर उच्च गुणवत्ता वाले पान के पत्ते उगाता है। पान की खेती में "बुरो" नामक संरक्षित संरचनाओं का उपयोग किया जाता है, जिनमें तापमान और आर्द्रता को नियंत्रित करके पौधों की विशेष देखभाल की जाती है। यह प्रक्रिया श्रमसाध्य है, लेकिन इसके परिणामस्वरूप उत्कृष्ट गुणवत्ता वाले पान के पत्ते प्राप्त होते हैं।

वर्तमान में, पान उत्पादक कई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। पान मसाला और गुटखा जैसे उत्पादों की बढ़ती लोकप्रियता ने पारंपरिक पान की मांग को प्रभावित किया है। युवा पीढ़ी में इन उत्पादों के प्रति बढ़ते रुझान के कारण पान की खपत में थोड़ी कमी आई है, जिससे किसानों की आय भी प्रभावित हुई है। इसके बावजूद, पारंपरिक पान का सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व आज भी बना हुआ है, जिसके चलते इसकी मांग स्थिर बनी हुई है।

भारतीय संस्कृति में पान का विशेष स्थान है। यह न केवल स्वाद और ताजगी का प्रतीक है, बल्कि पूजा-पाठ, विवाह समारोहों और आतिथ्य सत्कार में भी इसका महत्वपूर्ण उपयोग होता है। इसी सांस्कृतिक महत्व के कारण आज भी पान का महत्व बना हुआ है।

मध्य प्रदेश का पान न केवल स्थानीय बाजार में बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी अपनी पहचान बना रहा है। यदि पान उत्पादकों को उचित प्रोत्साहन, विपणन सुविधाएं और जागरूकता मिले, तो यह क्षेत्र इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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