20/05/26

सुपवा (DLCSUPVA) के छात्र सीख रहे हैं फिल्मों के सेट बनाने का जादू: बॉलीवुड के नामी प्रॉडक्शन डिजाइनर राहुल बाला ले रहे हैं विशेष वर्कशॉप

जे कुमार रोहतक, 20 मई 2026: दादा लख्मी चंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ परफॉर्मिंग एंड विजुअल आर्ट्स (डीएलसीसुपवा) के फिल्म एवं टेलीविजन फैकेल्टी के छात्र इन दिनों सिनेमा की एक बेहद महत्वपूर्ण और भव्य विधा 'प्रॉडक्शन डिजाइनिंग' के गुर सीख रहे हैं। विश्वविद्यालय परिसर में आयोजित एक विशेष प्रैक्टिकल वर्कशॉप में बॉलीवुड के मशहूर प्रॉडक्शन डिजाइनर और आर्ट डायरेक्टर राहुल बाला छात्रों को फिल्मों के सेट तैयार करने की बारीकियों और उसकी तकनीकी प्रक्रियाओं से रूबरू करा रहे हैं।

'चमकीला' और 'अखाड़ा' जैसी फिल्मों के प्रॉडक्शन डिजाइनर हैं राहुल बाला

फिल्म एवं टेलीविजन फैकेल्टी के एफसी महेश टीपी ने मुख्य वक्ता का परिचय देते हुए बताया कि राहुल बाला फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII) पुणे और कॉलेज ऑफ आर्ट, दिल्ली जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से फोटोग्राफी व प्रॉडक्शन डिजाइन में प्रशिक्षित हैं।

  • प्रमुख प्रोजेक्ट्स: वे सोहम शाह फिल्म्स की चर्चित फिल्म 'चमकीला', स्टेज ओटीटी की लोकप्रिय वेब सीरीज 'अखाड़ा', और इम्तियाज अली द्वारा प्रस्तुत फिल्म 'जीना अभी बाकी है' जैसी बड़ी परियोजनाओं में बतौर मुख्य प्रॉडक्शन डिजाइनर अपनी कला का लोहा मनवा चुके हैं।

  • पुरस्कार: बच्चों पर आधारित उनकी शॉर्ट फिल्म 'दूरबीन' (जिसका सह-निर्माण और शूट उन्होंने खुद किया था) ने नेशनल डिजिटल फिल्म फेस्टिवल (NDFF 2021) में सर्वश्रेष्ठ सिनेमेटोग्राफी का पुरस्कार भी हासिल किया था।

फिल्मों की भव्यता सिर्फ कलाकारों से नहीं, पूरी टीम की मेहनत से होती है: कुलगुरु

विश्वविद्यालय के कुलगुरु डॉ. अमित आर्य ने कार्यशाला के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा:

"फिल्मों में दिखने वाली भव्यता सिर्फ कलाकारों या लोकेशन की देन नहीं होती, बल्कि उसके पीछे एक पूरी टीम की महीनों की कड़ी मेहनत छिपी होती है। जब भी आप किसी ऐतिहासिक या भव्य फिल्म को देखते हैं, तो उसके सेट आपको एक अलग ही काल्पनिक दुनिया में ले जाते हैं। लेकिन यह जादू अचानक नहीं बनता, इसके पीछे एक सुनियोजित और बेहद बारीकी से तैयार की गई तकनीकी प्रक्रिया होती है।"

कैसे बनता है फिल्मों का सेट? राहुल बाला ने सिखाए सूत्र

वर्कशॉप के दौरान छात्रों से संवाद करते हुए प्रॉडक्शन डिजाइनर राहुल बाला ने बताया कि सिनेमा मूल रूप से एक 'विजुअल आर्ट' (दृश्य कला) है, जहाँ हर एक फ्रेम को जीवंत बनाना होता है। उन्होंने सेट निर्माण की प्रक्रिया को समझाते हुए मुख्य बिंदु साझा किए:

  • निर्देशक का विजन और ब्लूप्रिंट: सबसे पहले स्क्रिप्ट और निर्देशक के विजन को समझकर एक विस्तृत ब्लूप्रिंट (नक्शा) तैयार किया जाता है। इसमें महलों या कमरों का आकार, दरवाजों की बनावट, रंगों का संयोजन (Color Palette) और दीवारों का टेक्सचर तक पहले से तय होता है।

  • मटेरियल का इस्तेमाल: ब्लूप्रिंट तैयार होने के बाद लकड़ी, फाइबर, प्लास्टर ऑफ पेरिस (POP) और अन्य विशेष सामग्रियों की मदद से सेट को धीरे-धीरे वास्तविक रूप दिया जाता है।

  • असंगत को सच दिखाना: कई बार ये सेट इतने असली और तकनीकी रूप से परफेक्ट बनाए जाते हैं कि दर्शक सिनेमाघरों या स्क्रीन पर उन्हें असली लोकेशन ही समझ बैठते हैं। यही बारीकी दर्शकों को सिर्फ कहानी ही नहीं सुनाती, बल्कि एक ऐसा भव्य विजुअल अनुभव देती है जो लंबे समय तक उनके जेहन में याद रहता है।

इस वर्कशॉप के जरिए सुपवा के भावी फिल्म मेकर्स, सिनेमेटोग्राफर्स और आर्ट डायरेक्टर्स को बॉलीवुड की आधुनिक कार्यशैली को बेहद करीब से समझने का एक बेहतरीन अवसर मिल रहा है।

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