08/12/25

वंदे मातरम् : इतिहास, विवाद और 2025 की लोकसभा बहस..........

वंदे मातरम् : इतिहास, विवाद और 2025 की लोकसभा बहस..........

भारत की स्वतंत्रता-गाथा में ऐसे अनेक प्रतीक हैं, जिन्होंने देशवासियों के हृदय में राष्ट्रप्रेम की ज्योति प्रज्वलित की। इन प्रतीकों में वंदे मातरम् का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। यह केवल एक गीत नहीं, बल्कि एक भावना है—जो भारतीय आत्मा, मातृभूमि के प्रति श्रद्धा, एकता, संघर्ष और बलिदान की प्रेरणा बनकर आज भी हमारे सामने खड़ी है। 2025 में जब इस गीत की 150वीं वर्षगांठ मनाने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष चर्चा हुई, तब यह एक बार फिर केंद्र में आ गया। यह चर्चा केवल एक गीत पर नहीं थी, बल्कि भारत की राष्ट्रीय पहचान, इतिहास और सांस्कृतिक समरसता पर भी विचार का एक महत्वपूर्ण अवसर थी।

वंदे मातरम् की रचना 1870 के दशक में बंगाल के महान साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। इसका प्रकाशन सबसे पहले 7 नवंबर 1875 को उनकी पत्रिका ‘बंगदर्शन’ में हुआ। बाद में, 1882 में यह उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ का हिस्सा बना। यद्यपि इसका जन्म साहित्यिक संदर्भों के भीतर हुआ, परंतु इसके शब्दों में निहित ऊर्जा जल्द ही राजनीतिक चेतना बन गई। गीत उस समय लिखा गया जब ब्रिटिश सत्ता भारतीय समाज को धार्मिक-सामाजिक आधार पर विभाजित कर रही थी। ऐसे माहौल में ‘वंदे मातरम्’ का स्वर, देश को माता के रूप में देखने और एकजुट होने का संदेश देता रहा।

1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने जब इसे पहली बार गाया, तब यह पूरे भारत में राष्ट्रवादी भावनाओं की ध्वनि बन गया। बंगाल विभाजन (1905) के विरोध में चले स्वदेशी आंदोलन में ‘वंदे मातरम्’ उद्घोष बनकर सड़कों पर गूँजने लगा। यह केवल गीत नहीं रहा, बल्कि अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध प्रतिरोध का नारा बन गया। देश के अनेक हिस्सों में लोग जब इसे गाते, तो पुलिस द्वारा मारपीट, जेल और दमन का सामना करना पड़ता था। फिर भी यह स्वर रुकता नहीं था। इसने असंख्य युवाओं को जागृत किया, स्वतंत्रता के लिए जान देने की प्रेरणा दी और स्वतंत्रता-आंदोलन के महत्त्वपूर्ण प्रतीकों में शामिल हो गया।

यह गीत भारतीय संस्कृति में मातृभूमि को ‘देवी’ के रूप में देखने की परंपरा को अभिव्यक्त करता है। इसमें भूमि, नदियों, लहराते खेतों, वर्षा, वनों और प्राकृतिक सौंदर्य की समृद्धि के वर्णन हैं, जो भारत की उर्वरता और मातृत्व को दर्शाते हैं। मातृभूमि का यह स्वरूप भारतीय समाज के लिए आत्मीय है, क्योंकि हमारे यहाँ धरती, नदी, वृक्ष—सभी को माँ की तरह पूजा जाता है। इसलिए वंदे मातरम् ने लोगों को धार्मिक विभाजनों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय एकता का भाव दिया। यह गीत समर्पण, स्वाभिमान और संकल्प की भावना को जगाता है, यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संविधान सभा में लंबी चर्चा के बाद वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत और जन गण मन को राष्ट्रीय गान का दर्जा दिया गया। 24 जनवरी 1950 को आधिकारिक रूप से वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार किया गया। इस निर्णय ने दोनों गीतों को समान सम्मान दिया, तथा यह स्पष्ट किया कि वे एक दूसरे के विकल्प नहीं, बल्कि भारत की बहुआयामी संस्कृति और इतिहास के पूरक प्रतीक हैं। इसके बावजूद समय बीतने के साथ वंदे मातरम् को विद्यालयों, सार्वजनिक मंचों और राष्ट्रीय अवसरों पर वह सम्मान कम ही मिला, जिसकी वह अपेक्षा करता था।

वंदे मातरम् की मूल रचना में कुल छह पद हैं। इनमें से कुछ पदों में देवी दुर्गा, कमला (लक्ष्मी) जैसे धार्मिक प्रतीकों का उल्लेख है। 1937 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने धार्मिक विविधता को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय किया कि केवल पहले दो पद सार्वजनिक रूप से गाए जाएँगे। उनका तर्क था कि शेष पद विभिन्न समुदायों, विशेषकर मुस्लिम समाज में असहजता पैदा कर सकते हैं। इस निर्णय के बाद यह गीत विवादों में आ गया। समर्थकों का मानना था कि यह ऐतिहासिक गीत का राजनीतिक रूप से अनावश्यक ‘खंडन’ था। आलोचकों का कहना था कि इससे भारत की बहुसांस्कृतिक पहचान प्रभावित हुई।

वहीं, कुछ लोग इस बात पर भी ज़ोर देते हैं कि वंदे मातरम् को देवी आराधना तक सीमित नहीं समझना चाहिए, बल्कि इसे मातृभूमि—अर्थात धरती के प्रति आदर की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। वास्तव में, गीत प्रकृति और मातृभूमि की सुंदरता को, देवी-स्वरूप की उपमा के माध्यम से प्रस्तुत करता है, न कि किसी धर्म विशेष की स्थापना करता है।

2025 की शीतकालीन सत्र में वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ के अवसर पर लोकसभा में विशेष चर्चा आयोजित की गई। इस बहस ने ऐतिहासिक निर्णयों, राजनीतिक दृष्टि और सामाजिक समरसता को फिर से विषय बना दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने वक्तव्य में कहा कि वंदे मातरम् ने गुलाम भारत को एकजुट किया और स्वतंत्रता के संघर्ष में नई ऊर्जा भरी। उन्होंने 1937 में हुए संशोधन को “राष्ट्रीय गीत का अपमान” बताया और आरोप लगाया कि यह मुस्लिम लीग के दबाव में किया गया था। उनके अनुसार, यह गीत भारतीय संस्कृति के सम्मान का प्रतीक है और इसे राजनीतिक दृष्टि से नहीं बल्कि राष्ट्रीय दृष्टि से देखा जाना चाहिए।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि वंदे मातरम् को स्वतंत्र भारत में वह सम्मान नहीं मिला जिसकी वह पात्र है। उन्होंने इसे ‘पूर्णत: राष्ट्रमय’ गीत बताया और कहा कि इसे किसी धार्मिक पहचान से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। वहीं विपक्ष के कुछ नेताओं ने इस बहस की समय-संगति पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि देश में बेरोज़गारी, महँगाई, सामाजिक असमानता और रक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा ज़रूरी थी, लेकिन सरकार इतिहास के भावनात्मक प्रतीकों का राजनीतिक उपयोग कर रही है।

यह बहस केवल अतीत का मुद्दा नहीं उठाती, बल्कि यह सवाल भी पूछती है कि भविष्य में वंदे मातरम् किस रूप में हमारे समाज और राष्ट्र-निर्माण का हिस्सा रहेगा। क्या इसे केवल ऐतिहासिक विरासत मानकर भुला दिया जाए? या इसे शिक्षा, संस्कृति और नागरिकता के क्षेत्र में नए उत्साह के साथ स्थापित किया जाए? महत्वपूर्ण यह है कि इसे किसी एक समुदाय या विचारधारा तक सीमित न किया जाए, बल्कि इसे भारतीय राष्ट्रवाद की साझा विरासत के रूप में स्वीकार किया जाए।

वंदे मातरम् यदि सही संदर्भ, संवेदनशीलता और इतिहास की सटीक समझ के साथ प्रस्तुत किया जाए, तो यह न केवल राष्ट्रभक्ति को प्रेरित करेगा बल्कि सामाजिक समरसता को भी बढ़ावा देगा। आज के युवाओं को वंदे मातरम् केवल गाना नहीं चाहिए, बल्कि इसे पढ़ना, समझना और इसके ऐतिहासिक महत्व को पहचानना चाहिए। तभी यह गीत भविष्योन्मुखी राष्ट्रीय शक्ति बन सकता है।

वंदे मातरम् वह स्वर है जिसने दमनकारी सत्ता को चुनौती दी, असंख्य भारतीयों को स्वतंत्रता के संघर्ष में प्रेरित किया और भारत की मिट्टी के प्रति समर्पण की ज्योति जगाई। यह केवल कविता नहीं है; यह भारतीयता का घोष है। इसके साथ जुड़े विवाद हमें याद दिलाते हैं कि राष्ट्रीय प्रतीक केवल इतिहास नहीं होते, वे वर्तमान की राजनीति, संस्कृति और समाज से लगातार जुड़े रहते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि वंदे मातरम् को न तो राजनीतिक उपयोग के वस्त्र में लपेटा जाए और न ही धार्मिक विवादों में फँसाया जाए। इसे उस रूप में स्वीकार किया जाए, जिसमें यह लिखा गया था—भारत माता की सुंदरता, समृद्धि, और गौरव का गुणगान। जब हम वंदे मातरम् का उच्चारण करते हैं, तो हम केवल एक गीत नहीं गाते, बल्कि अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम, कृतज्ञता और वफादारी की प्रतिज्ञा दोहराते हैं। यही है वंदे मातरम् का वास्तविक संदेश, जो आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाया जाना चाहिए।

(के.के.)

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