भारत में सनातन और हिंदू का उल्लेख करने पर समझ से परे हैरान करने वाली प्रतिक्रिया उत्पन्न करना विडंबनापूर्ण और दु:खद है: उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़

आरएस अनेजा, 04 जनवरी नई दिल्ली

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने आज कहा कि यह विडम्बनापूर्ण और दुखद है कि भारत में हिंदू और सनातन का उल्लेख करने पर हैरान करने वाली प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

श्री धनखड़ ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कन्वेंशन सेंटर में आज 27वें अंतरराष्ट्रीय वेदांत सम्मेलन में अपने उद्घाटन भाषण में कहा, "हम सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक हैं जो कई मायनों में अद्वितीय और बेजोड़ है लेकिन विडंबना और पीड़ा की बात है कि इस देश में, सनातन और हिंदू का उल्लेख करना समझ से परे हैरान करने वाली प्रतिक्रियाएं पैदा करता है। इन शब्दों की गहराई, गहरे अर्थ को समझने के बजाय, लोग तुरंत प्रतिक्रिया करने लगते हैं। क्या अज्ञानता इससे भी अधिक चरम पर हो सकती है? क्या उनकी चूक की गंभीरता को स्वीकार किया जा सकता है। ये वे आत्माएं हैं जिन्होंने खुद को गुमराह किया है, जो एक खतरनाक प्रणालीगत तंत्र द्वारा संचालित हैं जो न केवल इस समाज बल्कि उनके लिए भी खतरा है।"

उन्होंने कहा, "हमारे देश में आध्यात्मिकता की इस भूमि में कुछ लोग वेदांत और सनातनी ग्रंथों को पश्चगामी मानते हैं। और वे ऐसा बिना जाने-समझे कर रहे हैं, यहां तक कि उन्होंने इन्हें देखा भी नहीं है। उन्हें पढ़ना तो दूर की बात है। यह इनकार अक्सर विकृत औपनिवेशिक मानसिकता, हमारी बौद्धिक विरासत की अकुशल समझ से उपजी है। ये तत्व एक व्यवस्थित तरीके से, एक भयावह तरीके से कार्य करते हैं। उनकी सोच घातक है। वे धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा को विकृत कर अपनी विनाशकारी विचार प्रक्रिया को छिपाते हैं। यह बहुत खतरनाक है। धर्मनिरपेक्षता का उपयोग ऐसे जघन्य कृत्यों को बचाने के लिए ढाल के रूप में किया गया है। इन तत्वों को उजागर करना हर भारतीय का कर्तव्य है।"


श्री धनखड़ ने वेदांत की समकालीन प्रासंगिकता पर विचार करते हुए कहा, "आग की लपटें, लगातार बढ़ते तनाव और अशांति पृथ्वी के हर हिस्से में व्याप्त हैं। यह स्थिति न केवल मनुष्यों के साथ, बल्कि जीवित प्राणियों के साथ भी है। जब जलवायु खतरे की अस्तित्वगत चुनौती की बात आती है, तो हम एक कठिन परिस्थिति का सामना कर रहे हैं। डिजिटल गलत सूचना, दुष्प्रचार से लेकर घटते संसाधन तक... इन अभूतपूर्व चुनौतियों के लिए नैतिक ज्ञान के साथ तकनीकी समाधान की आवश्यकता है, नैतिक ज्ञान और व्यावहारिक दृष्टिकोण वेदांत दर्शन की गहरी समझ द्वारा इस तरह के विचार-विमर्श से निकल सकते हैं।"


उन्होंने कहा, "यह केवल प्रश्नों का उत्तर नहीं देता। यह प्रश्नों के उत्तर देने से कहीं आगे जाता है। यह आपके संदेहों को दूर करता है। यह आपकी जिज्ञासा को शांत करता है। यह आपको पूरे विश्वास और समर्पण के साथ आगे बढ़ाता है। वेदांत आधुनिक चुनौतियों के साथ कालातीत ज्ञान को जोड़कर उत्प्रेरक का काम कर सकता है।"


श्री धनखड़ ने संसद में होने वाली अप्रिय स्थितियों और व्यवधानों का जिक्र करते हुए कहा, “राज्यसभा के सभापति के तौर पर मैं अपनी तरफ से हरसंभव प्रयास करता हूं। राज्यसभा वरिष्ठों का सदन है, राज्यों की परिषद है, उच्च सदन है और वहां हम कभी संवाद नहीं कर पाते। मुझे यकीन है कि अगर संसद के सदस्यों को वेदांत दर्शन का अध्ययन कराया जाए, तो वे निश्चित रूप से अधिक ग्रहणशील होंगे। मैं किसी न किसी तरह से आम लोगों को भी जिम्मेदार ठहराऊंगा क्योंकि उन्हें उन लोगों पर दबाव बनाना चाहिए जो अपना कर्तव्य निभाने में विफल रहते हैं। लोग ऐसा तब करते हैं जब कोई डॉक्टर अपना कर्तव्य नहीं निभाता है, जब कोई वकील अपना कर्तव्य नहीं निभाता है, जब कोई सरकारी कर्मचारी अपना कर्तव्य नहीं निभाता है। लेकिन जब आपके प्रतिनिधि अपना कर्तव्य नहीं निभाते हैं, तो आप उनसे निपटने के लिए उच्च स्तर पर आंदोलन क्यों नहीं करते? उनके कार्य वेदांत दर्शन की भावना के अनुरूप नहीं हैं।”



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