पिता-पुत्र पथरीले टुकड़ों को तराश कर कलाकृतियों को कर रहे हैं जीवंत

पिता-पुत्र पथरीले टुकड़ों को तराश कर कलाकृतियों को कर रहे हैं जीवंत
 
पंचम सदी की कंकड़ कला (पेबल आर्ट) को शिल्पकार प्रहलाद पंवार दिला रहे हैं पहचान

नदियों व सागर में मिलने वाले पथरीले
  टुकड़ों का कलाकृतियां बनाने में करते हैं इस्तेमाल

पंवार परिवार ने महिलाओं को अपने साथ जोड़कर बनाया आत्मनिर्भर


चंडीगढ़, (KK)- 37वें अंतरराष्ट्रीय सूरजकुंड मेले में देश के कोने-कोने से आए शिल्पकार अपनी अनोखी कलाकृतियों से दर्शकों का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। ऐसा सामान जिन्हें लोग व्यर्थ समझकर कोई तवज्जो नहीं देते, शिल्पकार उसे अपने हुनर से तराश कर जीवंत कर लाखों रुपये कमा रहे हैं। इन्हीं शिल्पकारों में महाराष्ट्र के परभनी जिला से आए शिल्पकार भगवान पंवार और उनके पुत्र प्रहलाद पंवार भी शामिल हैं। जिनके  द्वारा बनाई गई कलाकृतियां लोगों को खूब भा रही हैं। ये शिल्पकार पंचम सदी की प्रचलित कंकड़ कला को अपने हुनर के माध्यम से देश के कोने कोने में पहुंचाकर उसे पहचान दिला रहे हैं। बता दें कि कंकड़ कला को को पेबल आर्ट के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन काल में पत्थरों को तराशे बगैर ही विभिन्न प्रकार की मूर्तियां बनाई जाती थी। यह कला अब देश में लगभग लुप्त हो चुकी है, लेकिन भगवान पंवार व उनके बेटे प्रहलाद पंवार अपने परिवार सहित पुन: इस कला को जीवंत बनाने में लगे हुए हैं।


थीम सोचकर बनाते हैं कलाकृतियां


शिल्पकार प्रहलाद पंवार ने बताया कि पेबल आर्ट (कंकड़ कला) पंचम सदी की कला मानी जाती है। उस समय में पत्थरों को तराशने आदि की सुविधा नहीं थी। राजा महाराजा अपने शिल्पकारों से पत्थरों की अलग-अलग प्रकार की आकृतियां सजावट के लिए बनवाते थे। उन्होंने बताया कि वह देश के विभिन्न हिस्सों में प्रवाहित नदियों और सागर के किनारे जाकर वहां से छोटे-छोटे पत्थरीले टुकड़ों को इकट्ठा करते हैं। इसके पश्चात वह एक थीम सोचकर पत्थरों को बिना तोड़े ही तराश कर आकृतियों का रूप देते हैं। नदियों से निकलने वाले कंकड़-पत्थरों को जोडक़र बनाई गई कलाकृतियां ही पेबल आर्ट (कंकड़ कला) कहलाती है।


कलाकृतियां बनाकर पंवार परिवार हुआ आर्थिक रूप से मजबूत


बीएससी हार्टिकल्चर से पढ़ाई करने वाले शिल्पकार प्रहलाद पंवार ने बताया कि पहले वह इस कला को शौकिया किया करते थे। महाराष्ट्र राज्य के जिला परभनी में स्थित गांव वजूर के पास से गोदावरी नदी से वह कंकड़ बीनकर लाते थे और घर में बैठकर गोंद के माध्यम उसे विभिन्न स्वरूपों में जोडक़र आकृतियां बनाते थे। इस कला से बनाई आकृतियों की मांग बढऩे पर उन्होंने अपनी मां रूकमणी पंवार और धर्मपत्नी मोहिनी को भी इसी शिल्पकला से जोडक़र परिवार की आमदनी का जरिया बना लिया है। अब वह अपने आस-पास की एक दर्जन से अधिक महिलाओं को इस कला से जोडक़र आत्मनिर्भर बना चुके हैं। खास बात यह है कि कंकड़ कला में उपयोग किए जाने वाले पत्थरों को न तो तरासा जाता है और न ही उनकी तोडफ़ोड़ की जाती है। कंकड़-पत्थरों के प्राकृतिक स्वरूप से आकृतियां तैयार की जाती है। यह आकृतियां सजावट और उपहार देने में काम आती हैं।


रामायण के पात्रों की थीम पर भी बनाते हैं आकृति


शिल्पकार प्रहलाद ने बताया कि उनके द्वारा कंकड़ कला से बनाई गई छत्रपति शिवाजी की शासन प्रणाली और महात्मा गांधी के नमक आंदोलन की आकृति सबसे अधिक चर्चित रही हैं। यह कला देश से लुप्त हो चुकी थी। उनका कहना है कि देश में वह अकेले ऐसे शिल्पकार हैं, जो पंचम सदी की कंकड़ कला को पुनर्जीवित कर रहे हैं। अब वह रामायण के पात्रों की थीम पर पत्थरों के जरिए आकृति बनाने में जुटे हुए हंै। इसी कला के माध्यम से पंवार की आमदनी 75  हजार से एक लाख रुपए तक पहुंच गई है।

सूरजकुंड मेले में बनारस के स्पेशल मीठे पान का स्वाद चख रहे हैं सैलानी

पूरी तरह से तंबाकू फ्री और ऑर्गेनिक है बनारसी पान

बनारसी बाबू विनोद पांडे बनाते हैं 20 प्रकार के पान


सूरजकुंड की सुंदर वादियों में आयोजित किए जा रहे 37वें सूरजकुंड अंतरराष्ट्रीय शिल्प मेला में बनारस का मशहूर मीठा पान अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। मेला परिसर में अलग-अलग 10 स्थानों पर स्पेशल बनारसी बाबू पान का स्टाल लगाए गए हैं, जहां पर बनारस से आए शुभम और उनके भाई विनोद पांडे पर्यटकों को बिना कत्था, बिना चूना और बिना सुपारी का मीठा पान का स्वाद चखा रहे हैं। शुभम व विनोद कुमार अपने पिता जमना प्रसाद पांडे के पान के  पुश्तैनी कार्य को आगे बढा रहे हैं।
 विनोद पांडे ने बताया कि वे विभिन्न 20 प्रकार के पान बनाते हैं। इन सभी पान की खासियत है कि ये पूरी तरह से ऑर्गेनिक हैं और तंबाकू फ्री भी हैं। मुंह में डालकर चबाते ही पान पूरी तरह घुल जाता है। विनोद पांडे पिछले 8 वर्षों से सूरजकुंड मेला में लोगों को अपने पान का स्वाद चखाते आ रहे हैं। उनका कहना है कि वे सूरजकुंड मेला के अलावा ऑल इंडिया पर्यटन के कार्यक्रमों में भी शामिल होते हैं। गुरुग्राम के सूरजगढ़ रंगमंच और विशालगढ़ में उनके पान का स्थाई स्टॉल स्थापित है।


मशहूर गायक कुमार सानू, अभिनेता राजकुमार राव, गायक गुरु रंधावा, कनिका कपूर, एमसी स्क्वायर जैसे सेलिब्रिटी ने उनके पान का स्वाद चख रखा है।


विनोद पांडे को एक पान बनाने में करीब 3 से 4 मिनट का समय लगता है। उनके पास स्पेशल बनारसी बाबू पान में फायर पान, मीठा पान, चॉकलेट कोटिड पान, स्मोक पान, मैंगो पान, वाटर मैलन पान, घुंडी पान, चुस्की पान जैसे करीब 20 प्रकार के पान मेले में पर्यटकों की पसंद अनुसार बनाकर देते हैं।

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