पंजाब ने तो सेकंड रावी-ब्यास लिंक प्रोजेक्ट को नहीं माना — रावी का पानी आज भी पाकिस्तान जा रहा है, जिससे हरियाणा और राजस्थान प्यासे हैं
पी कुमार, 05 जुलाई, चंडीगढ़
करीब 12 वर्ष पहले केंद्र सरकार ने पंजाब सरकार से सैकंड रावी-ब्यास लिंक प्रोजेक्ट पर कार्य करने को कहा था। यदि यह प्रोजेक्ट समय पर शुरू होता, तो हरियाणा और राजस्थान की जल समस्या काफी हद तक हल हो सकती थी। लेकिन पंजाब ने इस प्रस्ताव को उस समय ही ठुकरा दिया था।
विडंबना यह है कि पंजाब को यह स्वीकार्य है कि रावी का पानी पाकिस्तान जाए, परंतु वह हरियाणा और राजस्थान को यह पानी मिलने नहीं देना चाहता।
यह उल्लेखनीय है कि यह प्रोजेक्ट रावी नदी के उस पानी को उपयोग में लाने हेतु प्रस्तावित था, जो 1960 की सिंधु जल संधि के तहत भारत के हिस्से में आया था। संधि के अनुसार, रावी, ब्यास और सतलुज का पानी भारत को मिला, जबकि चेनाब, झेलम और सिंधु का पानी पाकिस्तान को। इसके बावजूद, लगभग 0.58 मिलियन एकड़ फीट (एमएएफ) रावी का पानी आज भी पाकिस्तान बह रहा है।
केंद्र सरकार ने 2008 में इस जल बहाव को रोकने के लिए एक योजना स्वीकृत की थी, जिस पर लगभग ₹784 करोड़ का खर्च अनुमानित था।
2012 में सेंट्रल वॉटर कमीशन (CWC) की छठी बैठक में इस योजना को अंतिम रूप दे दिया गया था, लेकिन आज तक कोई ठोस कार्य नहीं हो सका।
हरियाणा पहले से ही सतलुज-यमुना लिंक (SYL) नहर के माध्यम से पानी की लड़ाई लड़ रहा है। CWC ने पंजाब सरकार को सुझाव दिया था कि उर्जी वर्क्स से गुजरते रावी के पानी को रोकने हेतु यदि एक बांध बनाया जाए और इस पानी को ब्यास नदी में डायवर्ट कर दिया जाए, तो यह हरियाणा और राजस्थान की जल आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकता है।
लेकिन पंजाब ने यह कहते हुए विरोध किया कि इससे राज्य में जलभराव (सेम) की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी।
मानसून के समय रावी से साढ़े तीन लाख क्यूसेक से अधिक पानी पाकिस्तान चला जाता है और सामान्यतः 0.58 एमएएफ पानी हर साल वहीं बहता है।
पंजाब सरकार का तर्क था कि इस परियोजना से राज्य की कृषि भूमि प्रभावित होगी, इसलिए वह किसी भी कीमत पर इस प्रोजेक्ट को स्वीकार नहीं करेगा।
तभी से यह परियोजना ठंडे बस्ते में पड़ी हुई है।
उधर SYL नहर का अधिकांश हिस्सा पहले ही पंजाब में निर्मित किया जा चुका है। यदि पंजाब सुप्रीम कोर्ट के 15 जनवरी 2002 और 4 जून 2004 के आदेशों का पालन करता, तो हरियाणा को यह पानी मिल चुका होता। लेकिन पंजाब ने कभी भी इन फैसलों की परवाह नहीं की, फिर 10 नवम्बर 2016 को तो सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब विधानसभा में पास किए सभी गैर कानूनी जल समझौतों को रद्द कर दिया। इतना ही नहीं 5736एकड़ भूमि जहां SYL है वह जमीन भी डिनोटिफाइ करके पंजाब के किसानों को वापस दी जा चुकी है।
हरियाणा का SYL में 3.5 एमएएफ का हिस्सा बनता है, जबकि अभी तक केवल 1.6 एमएएफ पानी ही मिल रहा है।
बाकी 1.9 एमएएफ पानी के लिए हरियाणा वर्षों से कानूनी लड़ाई लड़ रहा है। वर्तमान में तो हरियाणा को उतना भी पानी नहीं मिल रहा।
यदि केंद्र सरकार इच्छाशक्ति दिखाए, तो रावी का बहता हुआ कीमती पानी पाकिस्तान जाने से रोका जा सकता है।
हरियाणा में नहरी पानी की भारी जरूरत है। राज्य में लगभग 40 लाख हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि है, जिसमें से:
33% सिंचाई नहरों से,
50% ट्यूबवेल से,
17% वर्षा जल से होती है।
सैकंड रावी-ब्यास लिंक प्रोजेक्ट का उद्देश्य पाकिस्तान में व्यर्थ बहने वाले पानी को ब्यास नदी में मोड़कर पंजाब, हरियाणा और राजस्थान की कृषि और घरेलू आवश्यकताओं की पूर्ति करना था।