पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ FIR दर्ज होने या लंबित रहने पर नहीं रोकी जा सकती कर्मचारी की ग्रेच्युटी
अभिकान्त, 16 जुलाई चंडीगढ़ : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के हक में एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि अब केवल किसी कर्मचारी के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज होने या उसके लंबित रहने के आधार पर उसकी ग्रेच्युटी (Gratuity) को नहीं रोका जा सकेगा। यदि सक्षम अदालत में जांच एजेंसी द्वारा चालान या चार्जशीट (Chargesheet) पेश नहीं की गई है, तो कर्मचारी के सेवानिवृत्ति लाभ (Retirement Benefits) रोकने का सरकार के पास कोई कानूनी आधार नहीं होगा।
हाईकोर्ट के जस्टिस नमित कुमार ने इस मामले की सुनवाई करते हुए अपने आदेश में साफ तौर पर कहा कि सेवानिवृत्ति लाभ किसी भी तरह की कृपा, खैरात या राहत नहीं हैं, बल्कि यह कर्मचारी का अर्जित किया हुआ कानूनी अधिकार है। किसी भी कर्मचारी को कानून द्वारा स्थापित और निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना इन वित्तीय लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता।
अदालत ने याचिका को स्वीकार करते हुए पंजाब सरकार को कड़े निर्देश दिए कि रिटायर्ड एएसआई (ASI) को 1 मई, 2011 से 1 जनवरी, 2015 तक ग्रेच्युटी भुगतान में हुई देरी की पूरी अवधि के लिए 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज (Annual Interest) दिया जाए। इसके साथ ही, अदालत ने आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के दो महीने के भीतर इस पूरी प्रक्रिया को मुकम्मल करने की समय-सीमा भी तय की है।
मामले के विवरण के अनुसार, याचिकाकर्ता 28 फरवरी, 2011 को पंजाब पुलिस में एएसआई (Assistant Sub-Inspector) के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। सेवानिवृत्ति के बाद विभाग ने उनकी 5.50 लाख रुपये की ग्रेच्युटी को यह कहते हुए रोक दिया था कि उनके खिलाफ 19 फरवरी, 2007 को मोहाली के फेज-8 थाने में भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत एक एफआईआर दर्ज है।
याचिकाकर्ता ने अदालत के समक्ष पक्ष रखते हुए बताया कि पुलिस ने गहन जांच के बाद 12 जुलाई, 2007 (कर्मचारी के रिटायर होने से करीब 4 साल पहले) को ही अदालत में इस मामले की कैंसिलेशन रिपोर्ट (मामला बंद करने की रिपोर्ट) दाखिल कर दी थी। इसके बावजूद विभाग ने उनकी ग्रेच्युटी दबाए रखी। बाद में, 1 जुलाई, 2014 को मोहाली की न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की अदालत ने इस कैंसिलेशन रिपोर्ट को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया। इसके बाद 13 अक्टूबर, 2014 को विभाग ने ग्रेच्युटी मंजूर की और 1 जनवरी, 2015 को जाकर इसका भुगतान किया गया। याचिकाकर्ता ने इसी चार साल की देरी के लिए सरकार से ब्याज दिलाने की गुहार लगाई थी।
दूसरी ओर, पंजाब सरकार की तरफ से अदालत में दलील दी गई कि याचिकाकर्ता के खिलाफ जब तक आपराधिक मामला पूरी तरह से समाप्त नहीं हो गया, तब तक नियमों के मुताबिक सेवानिवृत्ति लाभों को रोकना जायज था। सरकार का कहना था कि जैसे ही 1 जुलाई, 2014 को अदालत ने कैंसिलेशन रिपोर्ट स्वीकार की, विभाग ने बिना किसी अनुचित देरी के 13 अक्टूबर, 2014 को राशि स्वीकृत कर 1 जनवरी, 2015 को पूरा भुगतान कर दिया। इसलिए इस मामले में देरी के लिए ब्याज देने का कोई आधार नहीं बनता है।
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें और रिकॉर्ड देखने के बाद सरकार के दावों को खारिज कर दिया। अदालत ने पाया कि जब कर्मचारी रिटायर हुआ, तब तक पुलिस खुद उसे क्लीन चिट देकर कैंसिलेशन रिपोर्ट कोर्ट में डाल चुकी थी। जस्टिस नमित कुमार ने अपने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए व्यवस्था दी:
"किसी भी आपराधिक मामले में न्यायिक कार्यवाही (Judicial Proceedings) को तभी शुरू माना जाता है, जब सक्षम अदालत के समक्ष चालान या चार्जशीट पेश कर दी गई हो और अदालत ने संज्ञान लिया हो। सिर्फ एक एफआईआर का दर्ज होना या उसका अदालत में लंबित रहना, जबकि आरोपी के खिलाफ आरोप (Charges) भी तय न हुए हों, किसी भी स्थिति में रिटायरमेंट लाभ रोकने का आधार नहीं बन सकता।"
अदालत ने माना कि चूंकि सेवानिवृत्ति की तारीख तक अदालत में केवल कैंसिलेशन रिपोर्ट लंबित थी और कोई चार्जशीट नहीं थी, इसलिए ग्रेच्युटी रोकने का सरकार का फैसला पूरी तरह से गैर-कानूनी और अनुचित था, जिसके लिए कर्मचारी ब्याज पाने का हकदार है।
#HighCourtDecision #PunjabAndHaryanaHighCourt #GratuityRules #RetirementBenefits #EmployeeRights #PunjabPolice #LegalNews2026 #ChandigarhLaw #Danikkhabar
Previous
स्वास्थ्य सेवा में ड्रोन की 'ऊंची उड़ान': टीबी जांच का समय 15 से घटकर हुआ 5 दिन, मरीजों का खर्च ₹9,451 से सीधा ₹91!
Next