08/04/25

दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना मानहानि मामले में मेधा पाटकर को प्रोबेशन पर रिहा करने का आदेश, कोर्ट ने जुर्माना कम किया

नई दिल्ली, 08 अप्रैल (अभी): दिल्ली की एक कोर्ट ने मंगलवार को नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता और सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने मानहानि मामले में एक साल की प्रोबेशन अवधि दी है। बशर्ते कि वह अच्छे आचरण का बॉन्ड भरें। एक साल की प्रोविजन पीरियड पर रिहा करने का निर्देश दिया। उनकी उम्र को देखते हुए यह आदेश दिया गया है।



साल 2000 में दर्ज मामले में अपनी दोषसिद्धि और पांच महीने की सजा के खिलाफ पाटकर की दायर अपील पर सुनवाई करते हुए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विशाल सिंह ने कहा कि उन्होंने पाटकर की उम्र, अपराध की गंभीरता और इस बात को ध्यान में रखा है कि उन्हें पहले कभी दोषी नहीं ठहराया गया है। न्यायाधीश ने 70 वर्षीय पाटकर पर लगाए गए जुर्माने की राशि को भी 10 लाख रुपये से घटाकर एक लाख रुपये कर दिया।


वीके सक्सेना ने 2001 में पाटकर के खिलाफ मामला दर्ज कराया था। उस समय वे अहमदाबाद स्थित एनजीओ नेशनल काउंसिल फॉर सिविल लिबर्टीज के प्रमुख थे। सक्सेना ने पाटकर के खिलाफ 25 नवंबर 2000 को देशभक्त का असली चेहरा शीर्षक से एक प्रेस नोट जारी कर उन्हें बदनाम करने का मामला दर्ज कराया था।


प्रेस नोट में पाटकर ने कहा था कि हवाला लेन-देन से दुखी वीके सक्सेना खुद मालेगांव आए, एनबीए की तारीफ की और 40 हजार रुपये का चेक दिया। लोक समिति ने भोलेपन से तुरंत रसीद और पत्र भेजा, जो किसी भी चीज से ज्यादा ईमानदारी और अच्छे रिकॉर्ड रखने को दर्शाता है। लेकिन चेक भुनाया नहीं जा सका और बाउंस हो गया। जांच करने पर बैंक ने बताया कि खाता मौजूद ही नहीं है। पाटकर ने कहा कि सक्सेना देशभक्त नहीं बल्कि कायर हैं।


2001 में शिकायत दर्ज होने के बाद अहमदाबाद की एक एमएम अदालत ने आईपीसी की धारा 500 के तहत अपराध का संज्ञान लिया और सीआरपीसी की धारा 204 के तहत पाटकर के खिलाफ प्रक्रिया जारी की। 3 फरवरी, 2003 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार राष्ट्रीय राजधानी की एक सीएमएम अदालत को शिकायत मिली।


2011 में पाटकर ने खुद को निर्दोष बताया और मुकदमे का दावा किया। न्यायाधीश ने कहा कि पाटकर की हरकतें जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण थीं, जिसका उद्देश्य सक्सेना की अच्छी छवि को धूमिल करना था और इससे उनकी प्रतिष्ठा और साख को काफी नुकसान पहुंचा है। अदालत ने कहा कि आरोपी के बयान, जिसमें उसने शिकायतकर्ता को देशभक्त नहीं, बल्कि कायर बताया और हवाला लेनदेन में उसकी संलिप्तता का आरोप लगाया। ये न केवल मानहानिकारक थे, बल्कि नकारात्मक धारणाओं को भड़काने के लिए भी तैयार किए गए थे।


अदालत ने कहा कि इसके अलावा यह आरोप कि शिकायतकर्ता गुजरात के लोगों और उनके संसाधनों को विदेशी हितों के लिए गिरवी रख रहा है, उसकी ईमानदारी और सार्वजनिक सेवा पर सीधा हमला है। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता के परिचितों के बीच हुई पूछताछ और संदेह, साथ ही गवाहों द्वारा उजागर की गई धारणा में बदलाव, उसकी प्रतिष्ठा को हुए महत्वपूर्ण नुकसान को रेखांकित करता है। 

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