04/12/25

डूबता रुपया बनाम डॉलर- अर्थव्यवस्था के लिए चेतावनी या नया अवसर..........?.

डूबता रुपया बनाम डॉलर- अर्थव्यवस्था के लिए चेतावनी या नया अवसर..........?.

भारतीय रुपये की कीमत लगातार अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गिरती जा रही है। रुपये की यह गिरावट सिर्फ करंसी का उतार-चढ़ाव नहीं है, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति, वैश्विक बाजार में बदलती परिस्थितियां और व्यापार नीति के प्रभावों का मिला-जुला परिणाम है। जब भी रुपये का मूल्य कमजोर होता है, इसका सीधा असर देश के आयात-निर्यात, विदेशी निवेश, महंगाई और आम जन-जीवन पर पड़ता है। आज रुपया 90 से ऊपर का स्तर पार कर चुका है और चिंता यह है कि यह स्थिति आगे कैसी रहेगी।

रुपये का डॉलर के मुकाबले कमजोर होना कई आर्थिक, राजनीतिक और वैश्विक कारणों से जुड़ा हुआ है। दुनिया के अधिकांश व्यापारिक लेन-देन, तेल खरीद और रक्षा सौदे डॉलर में होते हैं। ऐसे में जैसे-जैसे वैश्विक माहौल अस्थिर होता है, निवेशक अपनी पूंजी को सुरक्षित रखने के लिए डॉलर की ओर रुख करते हैं, जिससे डॉलर मजबूत और बाकी मुद्रा कमजोर होती चली जाती है। भारत जैसे देश, जो तेल आयात पर निर्भर हैं, उन्हें बढ़ती मांग के कारण अधिक डॉलर खर्च करना पड़ता है। इस वजह से देश की विदेशी मुद्रा भंडारण क्षमता प्रभावित होती है और रुपये पर दबाव बढ़ता है।

रुपये के कमजोर होने से सबसे बड़ा असर सीधे जनता तक पहुँचता है। जब डॉलर महंगा होता है, तो आयातित वस्तुएँ भी महंगी हो जाती हैं। इसमें पेट्रोल-डीजल सबसे बड़ा उदाहरण हैं। तेल महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिसका परिणाम भोजन, सब्ज़ी, फल, परिवहन, दवाइयों और दैनिक उपयोग की वस्तुओं पर पड़ता है। भारत कई इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद, मोबाइल, दवाओं का कच्चा माल विदेश से आयात करता है, इसलिए रुपये के डूबने का मतलब महंगाई की लहर है। यह आम आदमी की जेब पर सीधा बोझ बनकर गिरता है।

लेकिन रुपये की गिरावट के बावजूद इसमें अवसर भी छिपे हैं। जब मुद्रा कमजोर होती है, तो विदेशी बाजार में भारतीय वस्तुएँ सस्ती हो जाती हैं और इससे निर्यात बढ़ने की संभावनाएं बनती हैं। यदि सरकार सही उद्योगों पर ध्यान दे, जैसे फार्मा, आईटी सेवा, कृषि उत्पाद, वस्त्र उद्योग और छोटे इंजीनियरिंग सामान, तो भारत निर्यात के जरिए बड़ी कमाई कर सकता है। कमजोर रुपया निर्यातक उद्योगों के लिए लाभकारी हो सकता है, बशर्ते सरकार नीतिगत सहयोग दे।

डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर इसलिए भी होता है, क्योंकि डॉलर की मजबूती केवल आंकड़ों की नहीं, विश्वास की लड़ाई है। अमेरिका की आर्थिक और वैश्विक स्थिति पर दुनिया भरोसा करती है। भारतीय रुपये को मजबूती देने के लिए भारत को निवेशकों का भरोसा जीतना होगा। यह तभी संभव होगा जब देश स्थिर आर्थिक नीतियाँ अपनाए, विदेशी निवेश आकर्षित करे और व्यापारिक माहौल को सुगम बनाए। भारत को डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए रूस, ईरान जैसे देशों से स्थानीय मुद्रा में व्यापार बढ़ाना चाहिए। यह नीति भविष्य में डॉलर के दबदबे को कम कर सकती है।

देश में डिजिटल करेंसी की तैयारी भारतीय रुपये की वैश्विक विश्वसनीयता को बढ़ा सकती है। आज यूपीआई जैसे भुगतान तंत्र दुनिया का ध्यान खींच रहे हैं। यदि भविष्य में भारतीय भुगतान प्रणाली विदेशी देशों में अपनाई जाती है, तो रुपये की स्वीकार्यता स्वतः बढ़ सकती है। यह डॉलर जैसे एकाधिकार को चुनौती देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।

कुल मिलाकर, गिरता रुपया सिर्फ आर्थिक संकट का संकेत नहीं बल्कि जागरूकता का संदेश भी है। यह वित्तीय सुधार, निवेश नीति और निर्यात वृद्धि की तरफ बढ़ने के अवसर प्रस्तुत करता है। यदि भारत ऊर्जा निर्भरता कम करे, निर्यात बढ़ाए, पारदर्शी नीतियाँ अपनाए और विदेशी निवेश आकर्षित करे, तो गिरता हुआ रुपया भविष्य में मजबूत मुद्रा के रूप में उभर सकता है। रुपये का डूबना केवल चिंता नहीं, बल्कि आर्थिक रणनीति को नया स्वरूप देने का अवसर है। यदि सही कदम उठाए जाएं, तो कमजोर रुपया भी मजबूत अर्थव्यवस्था की नींव बन सकता है।

के.के..

Previous

दैनिक खबर प्रस्तुत करता है भारत में बीते 24 घंटे में हुइ आपराधिक घटनाएं

Next

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने श्री आर. वेंकटरमण को उनकी जयंती पर पुष्पांजलि अर्पित की