“हवाएं लाख मुखालिफ हों, मगर यह तय है कि दिया वहीं जलेगा, जो अपनी जिद पर अड़ा है”
K.K
हरियाणा की राजनीति एक बार फिर गरमाई हुई है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के पद पर भूपेंद्र सिंह हुड्डा की ताजपोशी के बाद सियासी बयानबाज़ी तेज हो गई है। इसी कड़ी में ऊर्जा, परिवहन एवं श्रम मंत्री अनिल विज का एक बयान खासा चर्चा में है— “हवाएं लाख मुखालिफ हों, मगर यह तय है कि दिया वहीं जलेगा, जो अपनी जिद पर अड़ा है।” यह पंक्ति केवल एक शेर या भावनात्मक कथन नहीं, बल्कि हरियाणा की वर्तमान राजनीतिक तस्वीर पर सीधा और सटीक कटाक्ष मानी जा रही है।
अनिल विज का यह बयान भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेता प्रतिपक्ष बनने पर एक सधा हुआ लेकिन तीखा राजनीतिक संदेश है। विज का राजनीतिक स्वभाव हमेशा से ही बेबाक रहा है। वे न तो शब्दों को तोलकर बोलने में विश्वास रखते हैं और न ही राजनीतिक शिष्टाचार की आड़ में अपनी बात छिपाते हैं। ऐसे में उनका यह कथन साफ संकेत देता है कि राजनीति में पद से ज्यादा महत्व संकल्प, संघर्ष और जनविश्वास का होता है।
भूपेंद्र सिंह हुड्डा लंबे समय तक हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे हैं और कांग्रेस की राजनीति का एक बड़ा चेहरा माने जाते हैं। लेकिन समय के साथ उनकी राजनीति पर ठहराव और अतीतजीवी होने के आरोप भी लगते रहे हैं। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद मिलने के बावजूद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे केवल सरकार की आलोचना तक सीमित न रहें, बल्कि जनता को यह भरोसा दिला सकें कि वे आज भी प्रासंगिक हैं।
अनिल विज का कटाक्ष इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। उनका कहना है कि राजनीति में वही दीया जलता है जो अपने संकल्प पर अडिग रहता है, न कि वह जो हर बदलती हवा के साथ अपनी दिशा बदल ले। विज स्वयं को इसी श्रेणी में रखते हैं—एक ऐसा नेता जो विरोध, विवाद और आलोचनाओं के बावजूद अपने रुख से पीछे नहीं हटता।
विज का राजनीतिक सफर इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने कई बार अकेले खड़े होकर भी मुद्दे उठाए। चाहे वह भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ हो, प्रशासनिक सख्ती हो या फिर सरकार के भीतर ही सवाल खड़े करने का साहस—अनिल विज ने कभी भी लोकप्रियता या आलोचना की परवाह नहीं की। यही “जिद” उनकी पहचान बन चुकी है।
इसके उलट, हुड्डा की राजनीति को लेकर यह सवाल उठता रहा है कि क्या वे अब भी उसी दृढ़ता के साथ संघर्ष कर पाएंगे, या फिर उनकी भूमिका केवल सत्ता पक्ष पर आरोप लगाने तक सीमित रह जाएगी। नेता प्रतिपक्ष का पद केवल विरोध का नहीं, बल्कि वैकल्पिक नीति और दृष्टि प्रस्तुत करने का मंच होता है। ऐसे में अनिल विज का बयान हुड्डा के लिए एक चुनौती की तरह देखा जा रहा है।
हरियाणा की जनता अब केवल भाषणों और आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति से संतुष्ट नहीं है। जनता परिणाम चाहती है, जवाबदेही चाहती है और ऐसे नेता चाहती है जो दबाव में भी अपने फैसलों पर कायम रहें। अनिल विज का मानना है कि राजनीति में टिके रहने के लिए रीढ़ की हड्डी का मजबूत होना जरूरी है।
विज का यह बयान यह भी दर्शाता है कि भाजपा नेतृत्व अपनी स्थिरता और आत्मविश्वास को लेकर आश्वस्त है। उनका संदेश साफ है—सरकार विरोध से नहीं डरती और न ही विपक्ष के पदों से विचलित होती है। अगर संकल्प मजबूत है, तो राजनीतिक आंधियां ज्यादा देर तक असर नहीं डाल सकतीं।
दूसरी ओर, भूपेंद्र सिंह हुड्डा के लिए यह समय आत्ममंथन का है। नेता प्रतिपक्ष के रूप में उन्हें यह साबित करना होगा कि वे केवल अतीत की उपलब्धियों के सहारे राजनीति नहीं कर रहे, बल्कि वर्तमान और भविष्य की स्पष्ट दृष्टि रखते हैं। अनिल विज का कटाक्ष इसी अपेक्षा की ओर इशारा करता है।
राजनीति में प्रतीकों और शब्दों का बड़ा महत्व होता है। “दीया” केवल प्रकाश का प्रतीक नहीं, बल्कि संघर्ष, धैर्य और निरंतरता का भी संकेत है। विज के अनुसार, जो नेता अपनी बात पर अड़ा रहता है, वही लंबे समय तक जनता के दिलों में जगह बनाता है।
आज हरियाणा की राजनीति एक नए दौर से गुजर रही है। सत्ता और विपक्ष—दोनों के लिए यह समय परीक्षा का है। एक ओर सरकार को अपने कामकाज से विश्वास बनाए रखना है, तो दूसरी ओर विपक्ष को जिम्मेदार और रचनात्मक भूमिका निभानी है।
अंततः अनिल विज का यह बयान केवल भूपेंद्र सिंह हुड्डा पर कटाक्ष नहीं, बल्कि समूची राजनीति के लिए एक संदेश है—कि पद अस्थायी होते हैं, लेकिन संकल्प और जिद ही नेता की असली पहचान बनती है। हवाएं कितनी भी मुखालिफ क्यों न हों, राजनीति में वही दीया जलता है जो अपने विश्वास की लौ को बुझने नहीं देता।