03/12/25

संसद को बाधित करना राष्ट्र को बाधित करना है......

संसद को बाधित करना राष्ट्र को बाधित करना है, क्योंकि संसद दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था है और उसकी हर मिनट की कार्यवाही देश की प्रगति को दिशा देती है। संसद का शीतकालीन सत्र 1 दिसंबर से शुरू हो चुका है और सर्वदलीय बैठक में विपक्ष ने संकेत दिया है कि वह एसआईआर सहित अनेक मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद करेगा। विपक्ष का सवाल उठाना उसका संवैधानिक अधिकार और कर्तव्य है, परंतु सवाल यह है कि क्या यह आवाज सार्थक बहस के रूप में सामने आएगी या फिर एक बार फिर शोर-शराबे और हंगामे की भेंट चढ़ते हुए भारत की लोकतांत्रिक मर्यादा को आहत करेगी। इस सत्र में कुल 15 बैठकें प्रस्तावित हैं और शिक्षा, सड़क, कॉरपोरेट कानूनों के साथ स्वास्थ्य एवं राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण विधेयक प्रस्तुत किए जाने हैं। इन सभी विषयों पर विचार-विमर्श आवश्यक है ताकि जनहित में ठोस नीतियाँ बन सकें। परंतु पिछले कई सत्रों का अनुभव बेहद निराशाजनक रहा है, जहाँ लोकसभा की उत्पादकता महज 31 प्रतिशत और राज्यसभा की 39 प्रतिशत के आसपास रह गई थी, जिससे यह स्पष्ट है कि वेल में नारेबाजी, प्लेकार्ड लहराना, कुर्सियां ठोकना और लगातार स्थगन जैसे दृश्य लोकतंत्र की छवि को धूमिल कर रहे हैं। संसद का एक-एक मिनट जनता की गाढ़ी कमाई से चलता है और उसका व्यर्थ जाना राष्ट्र की प्रगति को बाधित करता है। संसद संवाद और समाधान का मंच है, टकराव का अखाड़ा नहीं, इसलिए आवश्यक है कि सरकार और विपक्ष दोनों ही संयम, शालीनता और परिपक्वता का परिचय दें। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन मनभेद अनिवार्य नहीं। संसद का उद्देश्य असहमतियों को संवाद में बदलना है, जहां विपक्ष तथ्यपूर्ण प्रश्न पूछे और सरकार सम्मानपूर्वक उत्तर दे। प्रश्न तभी सार्थक है, जब उत्तर सुनने की इच्छा भी मौजूद हो। संसद की गरिमा केवल सभापति पर निर्भर नहीं, बल्कि हर सांसद की जिम्मेदारी पर आधारित है। सभापति का सम्मान, नियमों का पालन, तर्क एवं शालीनता के साथ बहस—इन्हीं मूल्यों पर संसद की प्रतिष्ठा टिकी है। जनता अपनी समस्याओं—महंगाई, रोजगार, सुरक्षा, कृषि, शिक्षा, सामाजिक सौहार्द और अर्थव्यवस्था—पर गंभीर बहस की अपेक्षा करती है। युवा पीढ़ी संसद को लोकतंत्र का आदर्श न मानकर अव्यवस्था का प्रतीक समझने लगे, यह चिंता का विषय है। इसलिए सत्ता और विपक्ष दोनों को समझना होगा कि वे सिर्फ दलों के नहीं, राष्ट्र की आत्मा के प्रतिनिधि हैं। अब आवश्यक है कि संसद नई संसदीय संस्कृति की शुरुआत करे—जहाँ राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हो। यदि यह सत्र संवाद, सौहार्द और समाधान का माध्यम बनकर उभरे और सकारात्मक, रचनात्मक और प्रगति की दिशा में कदम बढ़ाए, तो यह भारत के लोकतंत्र के इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय साबित होगा। देश उम्मीद कर रहा है कि जिस शांति और सहमति से सर्वदलीय बैठक संपन्न हुई, उसी भावना के साथ संसद का संचालन भी हो, क्योंकि संसद चलेगी तो राष्ट्र चलेगा, संसद सम्मानित होगी तो देश सम्मानित होगा और यदि संसद बाधित होगी तो राष्ट्र भी बाधित होगा।

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